अध्याय १

कल्पवृक्ष के समान भक्तजनों के मनोरथ को पूर्ण करने वाले वृन्दावन की शोभा के अधिपति अलौकिक कार्यों द्वारा समस्त लोक को चकित करने वाले वृन्दावनबिहारी पुरुषोत्तम भगवान् को नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥

नारायण, नर, नरोत्तम तथा देवी सरस्वती और श्रीव्यासजी को नमस्कार कर जय की इच्छा करता हूँ ॥ २ ॥

श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीगुरुभ्यो नमः ॥ श्रीगोपीजनवल्‍लभाय नमः ॥ वन्दे वन्दारुमन्दारं वृन्दावनविनोदिनम्‌ ॥ वृन्दावनकलानाथं पुरुषोत्तममद्‌भुतम्‌ ॥ १ ॥

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्‌ ॥ देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्‌ ॥ २ ॥

नैमिषायण्यमाजग्मुर्मुनयः सत्रकाम्यया ॥ असितो देवलः पैलः सुमन्तुः पिप्पलायनः ॥ ३ ॥

सुमतिः काश्यपश्चैव जाबालिर्भृगुरङ्गिराः ॥ वामदेवः सुतीक्ष्णश्च शरभङ्गश्च पर्वतः ॥ ४ ॥

आपस्तम्बोऽथमाण्डव्योऽगस्त्यः कात्यायनस्तथा ॥ रथीतरो ऋभुश्चैव कपिलो रैभ्य एव च ॥ ५ ॥

यज्ञ करने की इच्छा से परम पवित्र नैमिषारण्य में आगे कहे गये बहुत से मुनि आये। जैसे – असित, देवल, पैल, सुमन्तु, पिप्पलायन ॥ ३ ॥

सुमति, कश्यप, जाबालि, भृगु, अंगिरा, वामदेव, सुतीक्ष्ण, शरभंग, पर्वत ॥ ४ ॥

आपस्तम्ब, माण्डव्य, अगस्त्य, कात्यायन, रथीतर, ऋभु, कपिल, रैभ्य ॥ ५ ॥

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