अध्याय १०

नारदजी बोले – हे तपोनिधे! परम क्रोधी दुर्वासा मुनि ने विचार करके उस कन्या को क्या उपदेश दिया? सो आप मुझसे कहिये ॥ १ ॥

सूतजी बोले – हे द्विजो! नारद का वचन सुन समस्त प्राणियों का हितकर दुर्वासा का गुह्य वचन बदरीनारायण बोले ॥ २ ॥

श्रीनारायण बोले – हे नारद! मेधावी ऋषि की कन्या के दुःख को दूर करने के लिए कृपालु दुर्वासा मुनि ने जो कहा वह हम तुम से कहते हैं, सुनो ॥ ३ ॥

नारद उवाच ॥ किं विचार्य बृहद्धामा परमः कोपनो मुनिः ॥ अब्रवीदृषिकन्यां तां तन्मे ब्रूहि तपोनिधे ॥ १ ॥

सूत उवाच ॥ नारदस्य वचः श्रुत्वा प्रोवाच बदरीपतिः दुर्वासो वचनं गुह्यं सर्वेषां हितकृद्‌द्विजाः ॥ २ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ श्रृणु नारद वक्ष्येऽहं यदुक्तं  मुनिना तदा ॥ मेधावितनयादुःखमपनेतुं कृपालुना ॥ ३ ॥

दुर्वासा उवाच ॥ श्रृणु सुन्दरि वक्ष्यामि गुह्याद्‌गुह्यतरं महत्‌ ॥ आख्येयं नैव कस्यापि त्वदर्थं तु विचारितम्‌ ॥ ४ ॥

न विस्तरं करिष्यामि समासेन ब्रवीमि ते ॥ इतस्तृतीयः सुभगे मासस्तु पुरुषोत्तमः ॥ ५ ॥

तस्मिन्‌ स्नातो नरस्तीर्थे मुच्यते भ्रूणहत्यया ॥ एतत्तुल्यो न कोऽप्यन्यः कातिकादिपु सुन्दरि ॥ ६ ॥

दुर्वासा बोले – हे सुन्दरि! गुप्त से भी गुप्त उपाय मैं तुझसे कहता हूँ। यह विषय किसी से भी कहने योग्य नहीं है तथापि तेरे लिए तो मैंने विचार ही लिया है ॥ मैं विस्तार पूर्वक न कहकर तुझसे संक्षेप से कहता हूँ। हे सुभगे! इस मास से तीसरा मास जो आवेगा वह पुरुषोत्तम मास है ॥ ५ ॥

उस मास में तीर्थ में स्नान कर मनुष्य भ्रूणहत्या से छूट जाता है। हे सुन्दरि! कार्तिक आदि बारहों मासों में इस पुरुषोत्तम मास के बराबर और कोई मास नहीं है ॥ ६ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7