अध्याय १०

जितने मास तथा पक्ष और पर्व हैं वे सब पुरुषोत्तम मास की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं ॥ ७ ॥

वेदोक्त साधन और जो परमपद, प्राप्ति के साधन हैं वे भी इस मास की सोलहवीं कला के बराबर नहीं हैं ॥ ८ ॥

बारह हजार वर्ष गंगास्नान करने से जो फल मिलता है और सिंहस्थ गुरु में गोदावरी पर एक बार स्नान करने से जो फल मिलता है ॥ ९ ॥

सर्वे मासास्तथा पक्षाः पर्वाण्यन्यानि यानि च ॥ पुरुषोत्तममासस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्‌ ॥ ७ ॥

साधनानि समस्तानि निगमोक्तानि यानि च ॥ मासस्यैतस्य नार्हन्ति कलामपि च षोडशीम्‌ ॥ ८ ॥

द्वादशाद्वसहस्राणि गङ्गस्नानेन यत्फलम्‌ ॥ गोदावारी सकृत्स्नानाद्यत्फलं सिंहगे गुरौ ॥ ९ ॥

तदेव फलमाप्नोति मासे वै पुरुषोत्तमे ॥ सकृत्‌ सुस्नानमात्रेण यत्र कुत्रापि सुन्दरि ॥ १० ॥

श्रीकृष्णवल्लभो मासो नाम्ना च पुरुषोत्तमः ॥ तस्मिन्‌ संसेविते बाले सर्वं भवति वाञ्छितम्‌ ॥ ११ ॥

तस्मान्निषेवयाशु त्वं मासं तं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ मयापि सेव्यते सोऽयं पुरुषोत्तमवन्मुदा ॥ १२ ॥

हे सुन्दरि! वही फल पुरुषोत्तममास में किसी भी तीर्थ में एक बार स्नान करने मात्र से मिलता है ॥ १० ॥

हे बाले! यह मास श्रीकृष्ण का अत्यन्त प्यारा है और नाम से भी यह भगवान्‌ का स्मारक है। इस मास में पुरुषोत्तम भगवान्‌ की सेवा, पूजा करने से समस्त कामनाएँ सिद्ध होती हैं ॥ ११ ॥

अतः इस पुरुषोत्तम मास का तू शीघ्र व्रत कर। पुरुषोत्तम भगवान्‌ की तरह प्रसन्नतापूर्वक मैंने भी इस मास की सेवा की है ॥ १२ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7