अध्याय १०

एक समय क्रोध से मैंने अम्बरीष राजा को भस्म करने के अर्थ कृत्या भेजी थी सो हे बाले! तब हरि ने जलता हुआ सुदर्शन चक्र ॥ १३ ॥

मुझको ही भस्म करने के लिये उसी समय मेरे पास भेजा। तब पुरुषोत्तम मास के व्रत प्रभाव से ही वह चक्र हट गया ॥ १४ ॥

हे सुन्दरि! वह चक्र त्रैलोक्य को भस्म करने की सामर्थ्य रखने वाला जब मेरे पास आकर खाली चला गया तब मुझे बड़ा विस्मय हुआ ॥ १५ ॥

एकदा भस्मसात्क र्तुमम्बरीषं क्रुधा मया ॥ मुक्ता कृत्या तदा बाले सुनाभं हरिणा ज्वलत्‌ ॥ १३ ॥

मामेव भस्मसात्क॥र्तुं तदानीं प्रेरितं मयि ॥ पुरुषोत्तमव्रतादेव तच्चकं संन्यवर्तत ॥ १४ ॥

त्रैलोक्यं भस्मसात्क‍र्तुं समर्थं तच्च सुन्दरि ॥ मय्यकिञ्चित्कनरं जातं तदा मे विस्मयोऽभवत्‌ ॥ १५ ॥

तस्माद्भजस्व सुभगे श्रीमन्तं पुरुषोत्तमम्‌ ॥ इत्युक्त्वा  मुनिशार्दूलो विरराम मुनेः सुताम्‌ ॥ १६ ॥

श्रीकृष्ण उवाच ॥ दुर्वासो वचनं श्रुत्वा बाला मूढधियाऽवदत्‌ ॥ भाविना प्रेरिता राजन्नसूयोरिता सतो ॥ १७ ॥

दुर्वाससं मुनिश्रेष्ठं मनसि क्रोधसंयुता ॥ बालोवाच ॥ न मह्यं रोचते ब्रह्मन्‌ यदुक्तंा भवता मुने ॥ १८ ॥

इसलिये हे सुभगे! तू श्रीपुरुषोत्तम मास का व्रत कर। इस प्रकार मुनि की कन्या को कह कर दुर्वासा ऋषि ने विराम लिया ॥ १६ ॥

श्रीकृष्णजी बोले – हे राजन्‌! दुर्वासा ऋषि का वचन सुन भावी की प्रबलता के कारण असूया से प्रेरित वह कन्या मूर्खतावश दुर्वासा से बोली। बाला बोली – हे ब्रह्मन्‌! हे मुने! आपने जो कहा वह मुझे रुचता नहीं है ॥ १७-१८ ॥

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