अध्याय १०

माघादि मास कैसे कुछ भी फल देने वाले नहीं हैं? ‘कार्तिक मास कम है’ ऐसा आप कैसे कहते हैं? सो कहिये ॥ १९ ॥

वैशाख मास सेवित हुआ क्या इच्छित कामों को नहीं देता है? सदाशिव आदि से लेकर सब देवता सेवा करने पर क्या फल नहीं देते हैं? ॥ २० ॥

अथवा पृथ्वी पर प्रत्यक्ष देव सूर्य और जगत्‌ की माता देवी क्या सब कामनाओं को देने वाली नहीं हैं? ॥ २१ ॥

कथं माघादयो मासा अकिञ्चित्कऔरतां गताः ॥ कथं कार्तिकमासं त्वमूनं वदसि तद्वद ॥ १९ ॥

वैशाखः सेवितः किं वा न दास्यति सुकामितम्‌ ॥ सदाशिवादयो देवाः फलदा किं न सेविताः ॥ २० ॥

अथवा भुवि मार्तण्डो देवः प्रत्यक्षदर्शनः ॥ स किं न दाता कामानां देवा च जगदम्बिका ॥ २१ ॥

गणेशः सेवितः किं वा न संयच्छति कामितम्‌ ॥ व्यतीपातादिकान्‌ योगान्‌ देवान्‌ शर्वादिकानपि ॥ २२ ॥

सर्वानुल्लङ्घ्य वदतस्त्रपा किं ते न जायते ॥ अयं तु मलिनो मासः सर्वकर्मविगर्हितः ॥ २३ ॥

असूर्यसङ्क्रमः श्रेष्ठः क्रियते च कथं मुने ॥ वेदाहं सर्वदुःखानां पारदं श्रीहरिं परम्‌ ॥ २४ ॥

श्रीगणेश सेवा पाकर क्या इच्छित वर नहीं देते हैं? व्यतीपात आदि योगों को और शर्व आदि देवताओं को भी ॥ २२ ॥

सबको उल्लंघन करके पुरुषोत्तम मास की प्रशंसा करते क्या आपको लज्जा नहीं आती है? यह मास तो बड़ा मलिन और सब काम में निन्दित है ॥ २३ ॥

हे मुने! इस रवि की संक्रान्ति से रहित मास को आप श्रेष्ठ कैसे कह रहे हैं? सब दुःखों से छुड़ाने वाले परम श्रीहरि को मैं जानती हूँ ॥ २४ ॥

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