अध्याय १०

हे देव! दिन-रात श्रीहरि की चिन्तना करती मैं जानकीपति राम और पार्वतीपति शंकर के सिवाय और किसी को नहीं देखती हूँ ॥ २५ ॥

हे विप्रेन्द्र! अन्य कोई भी देवता ऐसा नहीं है जो मेरे दुःख को दूर करे, अतः हे मुने! इन सर्व फलदाताओं को छोड़कर कैसे इस मलमास की स्तुति आप कर रहे हो? ॥ २६ ॥

इस प्रकार ब्राह्मणकन्या का कहा हुआ सुनकर दुर्वासा मुनि शरीर से एक दम जाज्वल्यमान हो गये और नेत्र क्रोध से लाल हो गये ॥ २७ ॥

नान्यं पश्यामि भूदेव चिन्तयन्तो दिवानिशम्‌ ॥ रामाद्वा जानकीजानेः शङ्करात्‌ पार्वतीपतेः ॥ २५ ॥

नान्यःकोऽपि महान्‌ देवो यो मे दुःखं व्यपोहति ॥ एतान्‌ विहाय विप्रेन्द्र कथं स्तौषि मलं मुने ॥ २६ ॥

एवमुक्तस्तया विप्र-पुञ्या स क्रोधनो मुनिः ॥ जाज्वल्यमानो वपुषा क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ २७ ॥

तथापि न शशापैनां मित्रजां कृपयान्वितः ॥ मूढेयं नैव जानाति हिताहितमपूर्णधीः ॥ २८ ॥

पुरुषोत्तममाहात्म्यं दुर्ज्ञेयं विदुषामपि ॥ किमुताल्पघियां पुंसां कुमारीणां विशेषतः ॥ २९ ॥

पितृहीना कुमारीयं बाला दुःखाग्निभर्जिता ॥ अतीवोग्रतरं शापं मदीयं सहते कथम्‌ ॥ ३० ॥

इस प्रकार क्रोध आने पर भी कृपा करके मित्र की कन्या को शाप नहीं दिया और सोचने लगे कि यह मूर्खा है, हित-अनहित को नहीं जानती है, अभी बुद्धि इसकी पूर्ण नहीं है ॥ २८ ॥

पुरुषोत्तम के माहात्म्य का विद्वानों को भी पता नहीं है तो थोड़ी बुद्धिवाले पुरुषों एवं विशेष करके कुमारियों को तो हो ही कहाँ से सकता है? ॥ २९ ॥

यह कुमारी कन्या माता-पिता से रहित, दुःखाग्नि से जली हुई है, अतः अत्बुग्र मेरे शाप को कैसे सह सकती है? ॥ ३० ॥

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