अध्याय १०

इस प्रकार सोच कर कृपा से मन से उठे हुए क्रोध को शान्त किया और स्वस्थ होकर दुर्वासा मुनि, उस अति विह्वल कन्या से बोले ॥ ३१ ॥

दुर्वासा बोले – हे मित्र पुत्रि! तेरे ऊपर मेरा कुछ भी क्रोध नहीं है। हे निर्भाग्ये! जो तेरे मन में आये वैसा ही कर ॥ ३२ ॥

हे बाले! और तेरा कुछ भविष्य कहता हूँ सुन। पुरुषोत्तम मास का जो तूने अनादर किया है ॥ ३३ ॥

इत्येवं कृपया क्रोधं सञ्जहार मनःस्थितम्‌ ॥ स्वस्थो भूत्वो मुनिः प्राह तां बालामतिविह्वलाम्‌ ॥ ३१ ॥

दुर्वासा उवाच ॥ अहो बाले न मे कोपो मित्रजे त्वयि कश्चन्‌ ॥ यत्ते मनसि निर्भाग्ये यथारुचि तथा कुरु ॥ ३२ ॥

अपरं श्रयतां बाले भविष्यं किञ्चिदुच्यते ॥ पुरुषोत्तमासस्य यत्त्वयाऽनादरः कृतः ॥ ३३ ॥

सर्वथा तत्फलं भावि इह वा परजन्मनि ॥ अतः परं गमिष्यामि नरनारायणालयम्‌ ॥ ३४ ॥

न च शप्ता मया भीरु मन्मित्रं ते पिता यतः ॥ हिताहितं न जानासि बालभावाच्छुभाशुभम्‌ ॥ ३५ ॥

स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि मास्तु कालात्ययो मम ॥ अशुभं वाशुभं भाविशक्यते लंघितुं कथम्‌ ॥ ३६ ॥

उसका फल तुझे अवश्य मिलेगा। इस जन्म में मिले अथवा दूसरे जन्म में मिले। अब मैं नर-नरायण के आश्रम में जाऊँगा ॥ ३४ ॥

तेरा पिता मेरा मित्र था, इसलिये मैंने शाप नहीं दिया है, तू बालभाव के कारण अपने शुभाशुभ तथा हिताहित को नहीं जानती है ॥ ३५ ॥

शुभाशुभ भविष्य को कोई भी टाल नहीं सकता है। अच्छा, हमारा बहुत समय व्यतीत हो गया, अब हम जाते हैं, तेरा कल्याण हो ॥ ३६ ॥

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