अध्याय १०

श्रीकृष्ण बोले – ऐसा कहकर महाक्रोधी दुर्वासा मुनि शीघ्र चले गये। दुर्वासा ऋषि के जाते ही पुरुषोत्तम की उपेक्षा करने के कारण कन्या निष्प्रभा हो गयी ॥ ३७ ॥

तदनन्तर बहुत देर तक कन्या ने सोच-विचार कर यह निश्चय किया कि देवताओं के भी देवता, तत्काल फल को देने वाले, पार्वतीपति शिव की तप द्वारा आराधना करूँगी ॥ ३८ ॥

हे नृपे! मेधावी ऋषि की कन्या ने मन से इस प्रकार निश्चय करके अपने आश्रम में ही रह कर भगवान्‌ शंकर के कठिन तप करने को तत्पर हो गयी ॥ ३९ ॥

श्रीकृष्ण उवाच ॥ इत्युदीर्य जगामाशु तामसस्तापसो मुनिः ॥ तत्क्षणं निष्प्रभा साऽभूत्‌ पुरुषोत्तमहेलया ॥ ३७ ॥

विमृश्य सुचिरं कालं तत्कालफलदं शिवम्‌ ॥ आराधयामि देवेशं तपसा पार्वती पतिम्‌ ॥ ३८ ॥

इति निश्चित्य मनसा मेधावितनया नृपा ॥ दुष्करं तत्तपः कर्तुमियेष स्वाश्रम स्थिता ॥ ३९ ॥

सूत उवाच ॥ आर्षयी प्रबलमुनेर्वचो विनिन्द्य प्रोद्युक्तान्धकरिपुसेवने वने स्वे ॥ लक्ष्मीशं बहुलफलप्रदं विहाय सावित्रीपतिमपि तादृशं निरस्य ॥ ४० ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये श्रीनारायणनारदसंवादे कुमारीशिवाराधनोद्योगो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

सूतजी बोले – कि बहुत फलों के दाता लक्ष्मीपति को और वैसे ही सावित्रीपति ब्रह्मा को छोड़ कर एवं दुर्वासा के प्रबल वचन की निन्दा कर वह ऋषि कन्या अपने आश्रम में ही अन्धक को मारने वाले शंकर की सेवा के लिए तत्पर हो गयी ॥ ४० ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्येदशमोऽध्यायः समाप्तः ॥ १० ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7