अध्याय ११

नारदजी बोले – सब मुनियों को भी जो दुष्कर कर्म है ऐसा बड़ा भारी तप जो इस कुमारी ने किया वह हे महामुने! हमसे सुनाइये ॥ १ ॥

श्रीनारायण बोले – अनन्तर ऋषि-कन्या ने भगवान्‌ शिव, शान्त, पंचमुख, सनातन महादेव को चिन्तन करके परम दारुण तप आरम्भ किया ॥ २ ॥

सर्पों का आभूषण पहिने, देव, नन्दी-भृंगी आदि गणों से सेबित, चौबीस तत्त्वों और तीनों गुणों से युक्त ॥ ३ ॥

नारद उवाच ॥ अचीकरत्‌ कुमारीयं महत्कर्म सुदुष्करम्‌ ॥ मुनीनामपि सर्वेषां तन्मे वद महामुने ॥ १ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ अथारभत कल्याणी तपः परमदारुणम्‌ ॥ चिन्तयन्ती शिवं शान्तं पञ्चवक्त्रंन सनातनम्‌ ॥ २ ॥

भुजङ्गभूषणं देवं नन्दिभृङ्गिनिषेवितम्‌ ॥ चतुर्विंशतितत्त्वैश्र गुणैस्त्रिभिरभिष्टुतम्‌ ॥ ३ ॥

महासिद्धिभिरष्टाभिः प्रकृत्या पुरुषेण च ॥ चन्द्रखण्डलसद्भालं जटाजूटविराजितम्‌ ॥ ४ ॥

चचार दुश्चरं बाला तमुद्दिश्य परं तपः ॥ पञ्चाग्नीनां च मध्ये सा स्थायिनी ग्रीष्मगै रवौ ॥ ५ ॥

हेमन्ते शिशिरे चैव शीतवार्यन्तरस्थिता ॥ व्यक्तवक्त्रा  तथा रेजे जलस्थं कमलं यथा ॥ ६ ॥

अष्ट महासिद्धियों तथा प्रकृति और पुरुष से युक्त, अर्धचन्द्र से सुशोभित मस्तकवाले, जटा-जूट से विराजित ॥ ४ ॥

भगवान्‌ के प्रीत्यर्थ उस बाला ने परम तप आरम्भ किया। ग्रीष्म ऋतु के सूर्य होने पर पंचाग्नि के बीच में बैठकर ॥ ५ ॥

हेमन्त और शिशिर ऋतुओं में ठण्डे जल में बैठकर, खुले हुए मुखवाली जल में खिले हुए कमल की तरह शोभित होने लगी ॥ ६ ॥

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