अध्याय ११

सिर के नीचे फैली हुई काली और नीली अलकों से ढँकी हुई वह जल में ऐसी मालूम होने लगी जैसे कीचड़ की लता सेवारों के समूह से घिरी हुई हो ॥ ७ ॥

शीत के कारण नासिका से निकलती हुई शोभित धूम्‌राशि इस तरह दिखाई देने लगी जैसे कमल से मकरन्द पार करके भ्रमरपंक्ति जा रही हो ॥ ८ ॥

वर्षाकाल में आसन से युक्त चौतरे पर बिना छाया के सोती थी और वह सुन्दर अंगवाली प्रातः-सायं धूमपान करके रहती थी ॥ ९ ॥

शिरोऽधःप्रसृतश्यामनीलालकविलुण्ठिता ॥ जम्बालवल्लरीपुञ्जैर्वेष्टितेवबभौ जले ॥ ७ ॥

ब्रह्मरन्ध्रोद्गत श्रीमद्‌धूमराजिर्व्यदृश्यत ॥ नलिनं सेव्यमानेव मिलिन्दालि प्रसर्पिणी ॥ ८ ॥

वर्षास्वनावृता शेते स्थण्डिले वृसिकान्विते ॥ सन्ध्योरुभयोस्तन्वी धूम्रपानमचीकरत्‌ ॥ ९ ॥

पुरन्दरः परां चिन्तामवापाश्रुत्य तत्तपः ॥ दुर्धर्षा दिविजैः सर्वैः स्पृहणीया महर्षिभिः ॥ १० ॥

एवं तपसि वृत्तायामार्षेय्यां नृपनन्दन॥ गतान्यब्दसहस्राणि नव राजन्यभूषण ॥ ११ ॥

सन्तष्टस्तपसा तस्या भगवान्‌ पार्वतीपतिः ॥ दर्शयामास बालायै निजं रूपमगोचरम्‌ ॥ १२ ॥

उस कन्या के इस प्रकार के कठिन तप को सुन कर इन्द्र बड़ी चिन्ता को प्राप्त भए। सब देवताओं से दुष्प्रधर्षा और ऋषियों से स्पृहणीया ॥ १० ॥

उस ऋषि-कन्या के तप में लगे रहने पर हे नृपनन्दन! हे क्षत्रिय भूषण! नौ हजार वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ११ ॥

उस बाला के तप से भगवान्‌ शंकर ने प्रसन्न होकर उसे अपना इन्द्रियातीत निज स्वरूप दिखलाया ॥ १२ ॥

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