अध्याय ११

भगवान्‌ शंकर को देखकर देह में जैसे प्राण आ जाय वैसे सहसा खड़ी हो गई और तप से दुर्बल होने पर भी वह बाला उस समय हृष्टपुष्ट हो गयी ॥ १३ ॥

बहुत वायु और घाम से क्लेश पाई हुई वह शंकर को बहुत अच्छी लगी और उस कन्या ने झुककर पार्वतीपति शंकरजी को प्रणाम किया ॥ १४ ॥

उन विश्वोवन्दित भगवान्‌ का मानसिक उपचारों से पूजन करके और भक्तियुक्त चित्त से जगत्‌ के नाथ की स्तुति करने लगी ॥ १५ ॥

तद्‌दृष्ट्वा सहसोत्तस्थौ देहः प्राणमिवागतम्‌ ॥ तपःकृशापि सा बाला हृष्टपुष्टा तदाऽभवत्‌ ॥ १३ ॥

भूरिवातपसंक्लिष्टा देवमीढा गरीयसी ॥ सा बालाऽवनता भूत्वा ववन्दे गिरिजापतिम्‌ ॥ १४ ॥

मानसैरुपचारैस्तं सम्पूज्य विश्ववन्दितम्‌ ॥ तुष्टाव जगतां नाथं भक्तियुक्ते न चेतसा ॥ १५ ॥

बालोवाच ॥ अये शैलजावल्लभ प्राणनाथ प्रभो भर्ग भूतेश गौरीश शम्भो ॥ तमःसोमसूर्याग्निदिव्यत्रिनेत्र मदाधार मुण्डास्थिमालिन्नमस्ते ॥ १६ ॥

नरोऽनेकतापाभिभूताङ्गपीडः परे घोरसंसारवार्धो निमग्नः ॥ स्वलव्यालकालोग्रदंद्राभिदष्टो विमुच्येद्भवन्तं शरण्यं प्रपन्नः ॥ १७ ॥

कन्या बोली – हे पार्वतीप्रिय! हे प्राणनाथ! हे प्रभो! हे भर्ग! हे भूतेश! हे गौरीश! हे शम्भो! हे सोमसूर्याग्निनेत्र! हे तमः! हे मेरे आधार! मुण्डास्थिमालिन्‌! आपको प्रणाम है ॥ १६ ॥

अनेक तापों से व्याप्त है अंगों में पीड़ा जिसके ऐसा, तथा परम घोर संसाररूपी समुद्र में डूबा हुआ, दुष्ट सर्पों तथा काल के तीक्ष्ण दांतों से डँसा हुआ मनुष्य भी यदि आपकी शरण में आ जाए तो मुक्त हो जाता है ॥ १७ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9