अध्याय ११

हे विभो! जिन आपने बाणासुर को अपनाया और मरी हुई अलर्क राजा की पत्नीो को जिलाया ऐसे आप हे दयानाथ! भूतेश! चण्डीिश! भव्य! भवत्राण! मृत्युञ्जय! प्राणनाथ! ॥ १८ ॥

हे दक्षप्रजापति के मख को ध्वंस करने वाले! हे समस्त शत्रुओं के नाशक! हे सदा भक्तों को संसार से छुड़ाने वाले! हे जन्म के हर्ता, हे प्रथम सृष्टि के कर्ता! हे प्राणनाथ! हे पाप के नाश करने वाले! आप को नमस्कार है। अपने सेवकों की रक्षा कीजिये ॥ १९ ॥

विभो येन बाणः स्वकीयीकृतश्च मृता जीवितालर्कभूपालपत्नी  ॥ दयानाथ भूतेश चण्डीाश भव्य भवत्राण मृत्युञ्जय प्राणनाथ ॥ १८ ॥

मखध्वंसकर्तः समस्तारिहर्तः सदा सेवकानां भवध्वंसकर्तः ॥ नमो जन्महर्तः पुरा सृष्टिकर्तस्त्वदीयानव प्राणनाथाघहर्तः ॥ १९ ॥

इत्येवं मनसा वाचा शिवं स्तुत्वा तपस्विनी ॥ विरराम महाभागा मेधावितनया नृप ॥ २० ॥

श्रीकृष्ण उवाच ॥ तत्कृतं स्तोत्रमाकर्ण्य तपसोग्रतरेण च ॥ प्रसन्नवदनाम्भोजस्तामुवाच सदाशिवः ॥ २१ ॥

शिव उवाच ॥ वरं वरय भद्रं ते यस्ते मनसि वाञ्छितः ॥ प्रसन्नोऽस्मि महाभागे मा मा खिद तपस्विनि ॥ २२ ॥

हे नृप! बड़ी भाग्यवती मेधावी की तपस्विनी कन्या इस प्रकार मन से और वाणी से शंकर की स्तुति करके चुप हो गयी ॥ २० ॥

श्रीकृष्ण बोले – कन्या द्वारा की हुई स्तुति सुनकर और उसके किये हुए उग्रतप से प्रसन्न मुखकमल सदाशिव कन्या से बोले ॥ २१ ॥

हे तपस्विनि! तेरा कल्याण हो, तेरे मन में जो अभीष्ट हो वह वर तू माँग, हे महाभागे! मैं प्रसन्न हूँ, तू खेद मत कर ॥ २२ ॥

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