अध्याय ११

ऐसा भगवान्‌ शंकर का वचन सुन वह कुमारी अत्यन्त आनन्द को  प्राप्त हुई और हे राजन्‌! प्रसन्न हुए सदाशिव से बोली ॥ २३ ॥

कन्या बोली – हे दीनानाथ! हे दयासिन्धो! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो हे प्रभो! मेरी कामना पूर्ण करने में देर न करें ॥ २४ ॥

हे महादेव! मुझको पति दीजिये, पति दीजिये, पति दीजिये, मैं पति चाहती हूँ, पति दीजिये, मैंने हृदय में और कुछ नहीं सोचा है ॥ २५ ॥

तदाकर्ण्य कुमारीयं महानन्दपरिप्लुता ॥ उवाच वचनं राजन्‌ सुप्रसन्नं सदाशिवम्‌ ॥ २३ ॥

बालोवाच ॥ दीनानाथदयासिन्धो प्रसन्नश्चेन्ममोपरि ॥ तदा मत्कामितं देहि मा विलम्बं कुरु प्रभो ॥ २४ ॥

पतिं देहि पतिं मह्मं पतिं पतिमहं वृणे ॥ पतिं देहि महादेव नान्यन्मे चिन्तितं हृदि ॥ २५ ॥

एवमुक्त्वाप तदाऽऽर्षेयी विरराम कपर्दिनम्‌ ॥ तदाऽऽकर्ण्य महादेवो जगाद मुनिकन्यकाम्‌ ॥ २६ ॥

शिव उवाच ॥ त्वया यत्स्वमुखेनोक्तं तदस्तु मुनिकन्यके ॥ पञ्चकृत्वस्त्वया यस्मात्‌ पतिः सम्प्रर्थितोऽधुना ॥ २७ ॥

तस्मात्‌ पञ्च भविष्यन्ति पतयस्तव सुन्दरि ॥ शूराः सकलधर्मज्ञाः साधवः सत्यविक्रमाः ॥ २८ ॥

वह ऋषिकन्या इस प्रकार महादेव से कह कर चुप हो गयी तब यह सुन कर महादेव जी उससे बोले ॥ २६ ॥

शिव बोले – हे मुनिकन्यके! तूने जैसा अपने मुख से कहा है वैसा ही होगा क्योंकि तूने पाँच बार पति माँगा है ॥ २७ ॥

अतः हे सुन्दरी! तेरे पाँच पति होंगे और वे पाँचों वीर, सर्वधर्मवेत्ता, सज्जन, सत्यपराक्रमी ॥ २८ ॥

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