अध्याय ११

यज्ञ करनेवाले, अपने गुणों से प्रसिद्ध, सत्य प्रसिद्ध जितेन्द्रिय, तेरा मुख देखने वाले,सभी क्षत्रीय और गुणवान्‌ होंगे ॥ २९ ॥

श्रीकृष्ण बोले – न तो अधिक प्रिय, न तो अधिक अप्रिय ऐसे महादेव के बचन को सुनकर, बोलने में चतुरा कन्या झुककर बोली ॥ ३० ॥

बाला बोली – हे गिरिजाकान्त! सदाशिव! संसार में एक स्त्री का एक ही पति होता है, अतः पाँच पति का वर देकर, लोक में मेरी हँसी न कराइये ॥ ३१ ॥

यज्वानः स्वगुणख्याताः सत्यसन्धा जितेन्द्रियाः ॥ त्वन्मुखप्रेक्षकाः सर्वे राजन्या गुणशालिनः॥ २९ ॥

श्रीकृष्ण उवाच ॥ इत्याकर्ण्य वचस्तस्य धूर्जटैरनतिप्रियम्‌ ॥ उवाचावनता भूत्वा बाला वाक्यविशारदा ॥ ३० ॥

बालोवाच ॥ एवं मे गिरिजाकान्त मास्तु लोकेऽतिकैतुकम्‌ ॥ एकस्या एक एवास्ति भर्ता नार्याः सदाशिव ॥ ३१ ॥

न दृष्टा॥ न श्रुता क्वोपि नार्येका पञ्चभर्तृका ॥ एकस्य पञ्च पत्य्रदास्तु पुरुषस्य भवन्ति हि ॥ ३२ ॥

त्वदीयाहं कथं शम्भो भवेयं पञ्चभर्तृका ॥ नैवार्हसि वचस्त्वेवं मयि वक्तुं  कृपानिधे ॥ ३३ ॥

तवैव जायते लज्जा त्वदीयाहं यतः प्रभो ॥ इत्याकर्ण्य वचस्तस्याः शंङ्करः प्राह तां पुनः ॥ ३४ ॥

एक स्त्री पाँच पतिवाली न देखी गयी है और न सुनी गयी है। हाँ, एक पुरुष की पाँच स्त्रियाँ तो हो सकती हैं ॥ ३२ ॥

हे शम्भो हे कृपानिधे! आपकी सेविका मैं पाँच पतियों वाली कैसे हो सकती हूँ आपको मेरे लिये ऐसा कहना उचित नहीं है ॥ ३३ ॥

आपकी सेविका होने के कारण जो लज्जा मुझे हो रही है, वह आप अपने को ही समझिये। कन्या का यह वचन सुनकर शंकरजी पुनः उससे बोले ॥ ३४ ॥

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