अध्याय ११

शंकरजी बोले – हे भीरु! इस जन्म में तुझे पति सुख नहीं मिलेगा, दूसरे जन्म में जब तू तपोबल से बिना योनि के उत्पन्न होगी ॥ ३५ ॥

तब पति सुख को भोग कर अनन्तर परमपद्‌ को प्राप्त होगी क्योंकि मेरी प्रिय मूर्ति दुर्वासा का तूने पहिले अपमान किया है ॥ ३६ ॥

हे सुभ्रु! वह दुर्वासा यदि क्रोध करें तो तीनों भुवनों को जला सकते हैं सो तूने अभिमान वश ब्रह्मतेज का मर्दन किया है ॥ ३७ ॥

शिव उवाच ॥ मास्तु तेऽस्मिन्‌ भवे भीरु भव्यं तत्परजन्मनि ॥ अयोनिसम्भवा तत्र भविष्यसि तपोबलात्‌ ॥ ३५ ॥

भर्तृजं सुखमासाद्य ततो गर्न्त्री परं पदम्‌ ॥ दुर्वासा मे प्रियो मूर्तिः स त्वयाऽवमतः पुरा ॥ ३६ ॥

स चेत्‌ कोपावृतः सुभ्रु निर्दहेद्‌भुवनत्रयम्‌ ॥ त्वया गर्वातिरेकेण ब्रह्मतेजःप्रमर्दितम्‌ ॥ ३७ ॥

पुरुषोत्तमस्त्वया मासो न कृतो भगवत्प्रियः ॥ यस्मिन्नर्पितमैश्वयर्यं श्रीकृष्णेनात्मनः स्वकम्‌ ॥ ३८ ॥

अहं ब्रह्मादयो देवा नारदाद्यास्तपस्विनः ॥ यदादेशकरा बाले तदाज्ञां को विलङ्घयेत्‌ ॥ ३९ ॥

स मासो न त्वया मूढे पूजितो लोकपूजितः ॥ अतस्ते पञ्च भर्तारो भविष्यन्ति द्विजात्मजे ॥ ४० ॥

जिस अधिमास को भगवान्‌ कृष्ण ने अपना ऐश्व र्य दे दिया उस भगवान्‌ के प्रिय पुरुषोत्तममास का व्रत तूने नहीं किया ॥ ३८ ॥

मैं ब्रह्मा आदि से लेकर सब देवता, नारद आदि से लेकर सब तपस्वी, जिसकी आज्ञा सदा मानते चले आये हैं, हे बाले! उसकी आज्ञा का कौन उलंघन करता है? ॥ ३९ ॥

लोकपूजित पुरुषोत्तम मास की दुर्वासा की आज्ञा से तूने पूजा नहीं की हे मूढ़े! द्विजात्मजे! इसी लिये तेरे पाँच पति होंगे ॥ ४० ॥

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