अध्याय ११

हे बाले! पुरुषोत्तम के अनादर करने से अब अन्यथा नहीं हो सकता है। जो उस पुरुषोत्तम की निन्दा करता है वह रौरव नरक का भागी होता है ॥ ४१ ॥

पुरुषोत्तम का अपमान करने वाले को विपरीत ही फल होता है, यह बात कभी अन्यथा नहीं हो सकती है। पुरुषोत्तम के जो भक्त हैं वे पुत्र, पौत्र और धनवाले होते हैं ॥ ४२ ॥

नान्यथा भावि तद्‌बाले पुरुषोत्तमखण्डनात्‌ ॥ यो वै निन्दति तं मासं स याति घोररौरवम्‌ ॥ ४१ ॥

विपरीतं भवेत्तस्य न कदाप्यन्यथा भवेत्‌ ॥ पुरुषोत्तमस्य ये भक्ताः पुत्रपौत्रधनान्विताः ॥ ४२ ॥

परत्रेहभवां सिद्धि याता यास्यन्ति यान्ति च ॥ वयं सर्वेऽपि गीर्वाणाः पुरुषोत्तमसेविनः ॥ ४३ ॥

यस्मिन्‌ संसेविते शीघ्रं मीयते पुरुषोत्तमः ॥ सेवनीयं कथं मासं न भजामः सुमध्यमे ॥ ४४ ॥

और वे इस लोक को तथा परलोक की सिद्धि को प्राप्त हुए हैं, प्राप्त होंगे और प्राप्त हो रहे हैं। और हम सब देवता लोग भी पुरुषोत्तम की सेवा करने वाले हैं ॥ ४३ ॥

जिस पुरुषोत्तम मास में व्रतादिक से पुरुषोत्तम शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं उस सेवा करने योग्य मास को हे सुमध्यमे! हम लोग कैसे न भजें? ॥ ४४ ॥

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