अध्याय ११

उचित और अनुचित विचार की चर्चा करने वाले अतएव अनुकरणीय जो मुनि हैं उन अति उत्कट श्रेष्ठ तपस्वी पुरुषों का वचन कैसे मिथ्या हो सकता है? कहो ॥ ४५ ॥

इस प्रकार कथन करते हुए भगवान्‌ नीलकण्ठ शीघ्र ही अन्तर्धान हो गये और वह बाला यूथ से भ्रष्ट मृगी की तरह चकित सी हो गयी ॥ ४६ ॥

अत्युत्कहटानां महतां वचो मिथ्या कथं वद ॥ अनुनेया हि मुनयः सदसद्वादवादिनः ॥ ४५ ॥

वदन्नेवं नीलकण्ठः क्षिप्रमन्तर्दधे हरिः ॥ चकिता साऽभवद्‌ बाला यूथभ्रष्टा मृगी यथा ॥ ४६ ॥

सूत उवाच – शशाङ्कंलेखाङ्कितभालदेशे सदाशिवे शैवदिशं प्रयाते ॥ चिन्ता बबाधे मुनिराजकन्यां हत्वा यथा वृत्रहणं मुनीशाः ॥ ४७ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये शिववाक्यं नाम एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥

सूतजी बोले – हे मुनीश! रेखासदृश चन्द्रमा से युक्त मस्तकवाले सदाशिव जब उत्तर दिशा के प्रति चले गये तब वृत्रासुर को मारकर जैसे इन्द्र को चिन्ता हुई थी उसी प्रकार मुनिराज की कन्या को चिन्ता बाधा करने लगी ॥ ४७ ॥

इति श्रीबृहन्नारदीये पुरुषोत्तममासमाहात्म्ये एकादशोऽध्यायः समाप्तः ॥ ११ ॥

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