अध्याय १२

वर्षा ऋतु में मेघ से घिरे हुए आकाश में बिजली चमक कर जैसे नष्ट हो जाती है उसी प्रकार तपस्या से जले हुए पापवाली वह कन्या अपने आश्रम में मर गयी ॥ ७ ॥

उसी समय धर्मिष्ठ यज्ञसेन नामक राजा ने बड़ी सामग्रियों से युक्त उत्तम यज्ञ किया ॥ ८ ॥

उस यज्ञकुण्ड से सुवर्ण के समान कान्ति वाली एक लड़की उत्पन्न हुई । वही कुमारी द्रुपदराज की कन्या के नाम से संसार में विख्यात हुई ॥ ९ ॥

प्रावृण्मेघावृते व्योम्नि विद्युत्सौदामिनी यथा ॥ तथाऽऽश्रमे स्वके नष्टा तपसा दग्धकल्मषा ॥ ७ ॥

तदानीमेव धर्मिष्ठो यज्ञसेनो नराधिपः ॥ बृहत्सम्भारसम्पन्नमकरोद्यज्ञमुत्तमम्‌ ॥ ८ ॥

तद्यज्ञकुण्डादुद्‌भूता कुमारी कनकप्रभा ॥ सेयं द्रुपदशार्दूलतनया प्रथिता भुवि ॥ ९ ॥

द्रौपदी सर्वलोकेषु ह्यार्षेयी या पुराऽभवत् ॥ सेयं स्वयंवरे राजन् मत्स्यवेधे कृते सति ॥ १० ॥

लब्धार्जुनेन पाञ्चाली क्षुभिते राजमण्डे ॥ तृणीकृत्य नृपान् सर्वान् भीष्मकर्णादिकान्‌ बहून् ॥ ११ ॥

सेयं कचग्रहं प्राप्ता दुष्टदुःशासनान्मुने ॥ वचांसि कर्णशूलानि श्राविता वरवणिंनी ॥ १२ ॥

पहिले जो मेधावी ऋषि की कन्या थी वही सब लोकों में द्रौपदी नाम से प्रसिद्ध हुई । उसी को स्वयंवर में मछली को वेधकर ॥ १० ॥

भीष्म कर्ण आदि बहुत से राजाओं को तृण के समान कर क्षुभित रजमण्डदल में अर्जुन ने पांचाली को पाया ॥ ११ ॥

हे मुने! वही द्रौपदी दुष्ट दुःशासन द्वारा बाल पकड़ कर खींची गयी और उसे हृदय  विदीर्ण करने वाले वचन सुनाये गये ॥ १२ ॥

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