अध्याय १२

पुरुषोत्तम की अवहेलना करने के कारण मैंने भी उसकी उपेक्षा की। जब वह मेरे में स्नेह करके मेरा नाम बराबर लेने लगी ॥ १३ ॥

हे दामोदर! हे दयासिन्धो! हे कृष्ण! हे जगत्पते! हे नाथ रमानाथ! हे केशव! हे क्लेशनाशन! ॥ १४ ॥

मेरे माता, पिता, भ्रातृवर्ग, सहेलियें, बहिन, भाञ्जे, बन्धु, इष्ट, पति आदि कोई भी नहीं है। हे हृषीकेश! मेरे तो आप ही सब कुछ हैं ॥ १५ ॥

मया चोपेक्षिता राजन् पुरुषोत्तमहेलनात् ॥ यदा मयि कृतस्नेहा मन्नामान्यवदन्मुहुः ॥ १३ ॥

दामोदर दयासिन्धो कृष्ण-कृष्ण जगत्पते ॥ हे नाथ हे रमानाथ केशव क्लेशनाशन ॥ १४ ॥

न माता न तातो न च भ्रातृवर्गो न सख्यो न जातिर्न वै भागिनेयः ॥ न बन्धुर्न चेष्टो न वै प्राणनाथो हृषीकेश सर्वं भवानेव मेऽस्ति ॥ १५ ॥

गोविन्द गोपिकानाथ दीनबन्धो दयानिधे ॥ दुःशासनपराभूतां किं न जानासि मां प्रभो ॥ १६ ॥

दुःशासनपराभूता तदा द्रुपदनन्दिनी ॥ मदीयं स्मरणं प्राप्ता विस्मृताऽपि मया पुरा ॥ १७ ॥

शीघ्रं गरुडमारुह्य तत्राऽऽगत्य स्थितेन वै ॥ पूरितानि मया राजन्नस्यै वासांस्यनेकशः ॥ १८ ॥

हे गोविन्द! हे गोपिकानाथ! दीनबन्धो! दयानिधे! दुःशासन से आक्रमण की गई मुझे क्या आप नहीं जानते ॥ १६ ॥

यद्यपि पहली पुकार में मैंने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया था, पर जब दुःशासन से पराभूत होकर उसने मेरा पुनः स्मरण किया ॥ १७ ॥

तब गरुड़ पर चढ़ शीघ्र वहाँ पहुँच कर मैंने हे राजन्‌! उसे बहुत से वस्त्रों से परिपूर्ण कर दिया ॥ १८ ॥

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