अध्याय १२

सदा मेरे में स्नेह करने वाली, मैं ही हूँ प्राण जिसके ऐसी, सदा मेरे भजन में परायण, मेरी अत्यन्त प्रिया, सती, सखी, मुझको प्राणों के समान होने पर भी पुरुषोत्तम की अवहेलना करने के कारण उसकी उपेक्षा करनी पड़ी। पुरुषोत्तम का तिरस्कार करने वाले का मैं पतन कर देता हूँ ॥ १९-२० ॥

यह पुरुषोत्तम मुनियों और देवताओं से भी सेव्य है, फिर समस्त कामनाओं को देने वाला यह पुरुषोत्तम मनुष्यों द्वारा तो सेवनीय है ही ॥ २१ ॥

सदा मयिकृतस्नेहा मत्प्राणा मत्परायणा ॥ ममातिवल्लभा साध्वी सखी मे प्राणसन्निभा ॥ १९ ॥

तथाप्युपेक्षितेयं सा पुरुषोत्तमहेलनात्‌ ॥ हरिवल्लभमासस्यावमन्तुः पातनं मया ॥ २० ॥

निश्चितं मुनिदेवानां सेव्योऽयं पुरुषोत्तमः ॥ किं पुनर्मानुषाणां तु सर्वार्थफलदायकः ॥ २१ ॥

तस्मादाराधयस्वैनमागामि पुरुषोत्तमम्‌ ॥ वर्षे चतुर्दशे पूर्णे सर्वं ते भविता शुभम्‌ ॥ २२ ॥

व्यलोकि यैर्द्रौपद्याः केशाकृष्टि पाण्डुनन्दन ॥ तन्नारीणामहं राजन्निर्वपिष्येऽलकान्‌ रुषा ॥ २३ ॥

सुयोधनादिभूपालान्‌ सर्वान्नेष्ये यमालयम्‌ ॥ सर्वशत्रुक्षयंकृत्वा त्वं च राजा भविष्यसि ॥ २४ ॥

अतः आगामी पुरुषोत्तम की आराधना करो। चौदह वर्ष के सम्पूर्ण होने पर तुम्हारा कल्याण होगा ॥ २२ ॥

हे पाण्डुनन्दन! जिन पुरुषों ने द्रौपदी के बालों को खींचते हुए देखा है, हे महाराज! उनकी स्त्रियों की अलकों को मैं क्रोध से काटूँगा ॥ २३ ॥

दुर्योधन आदि राजाओं को यमराज के भवन को पहुँचाऊँगा, बाद तुम समस्त शत्रुओं का नाश कर राजा होंगे ॥ २४ ॥

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