अध्याय १२

न मेरे को लक्ष्मी प्रिय, न मेरे को बलभद्र जी प्रिय और न वैसे मेरे को देवी देवकी, न प्रद्युम्न, न सात्यकि प्रिय हैं ॥ २५ ॥

जैसे मेरे को भक्त प्रिय हैं वैसा कोई प्रिय नहीं है। जिसने मेरे भक्तों को पीड़ित किया उससे मैं सदा पीड़ित रहता हूँ ॥ २६ ॥

हे पाण्डव! उसके समान मेरा अन्य कोई शत्रु नहीं है, उसके अपराध का फल देने वाला यमराज है क्योंकि वह दुष्ट दण्ड देने के लिए भी मेरे से देखने के योग्य नहीं है ॥ २७ ॥

न मे क्षीरोदतनया प्रिया नापि हलायुधः ॥ न तथा देवकी देवी न प्रद्युम्नो न सात्यकिः ॥ २५ ॥

यादृशा मे प्रिया भक्ताास्तादृशो नास्ति कश्चन ॥ येन मे पीडिता भक्ताास्तेनाहं पीडितः सदा ॥ २६ ॥

द्वेष्यो मे नास्ति तत्तुल्यो यमस्तस्य फलप्रदः ॥ नाऽवलोक्यो मया दुष्टो दण्डार्थमपि पाण्डव ॥ २७ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ श्रीकृष्णस्तान्‌ समाश्वोस्य पाण्डवान्‌ द्रौपदीं तथा ॥ कुशस्थलीं जिगमिषुरुवाच मधुसूदनः ॥ २८ ॥

राजन्नद्य गमिष्यामि द्वारकां विरहाकुलाम्‌ ॥ वसुदेवो महाभागो बलदेवो ममाग्रजः ॥ २९ ॥

मन्माता देवकी देवी गदसाम्बादयोऽपरे ॥ आहुकाद्याश्च यादवो रुक्मिण्याद्याश्च याः स्त्रियः ॥ ३० ॥

श्रीनारायण बोले – श्रीकृष्ण ने उन पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरादिकों को और द्रौपदी को समझा कर द्वारका जाने की इच्छा से कहा ॥ २८ ॥

हे राजन्‌! वियोग से व्याकुल द्वारका पुरी को आज जाऊँगा जहाँ पर महाभाग वसुदेव जी, हमारे बड़े भाई बलदेवजी ॥ २९ ॥

हमारी माता देवी देवकी तथा गद, साम्ब आदि और आहुक आदि यादव, रुक्मिणी आदि जो स्त्रियाँ हैं ॥ ३० ॥

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