अध्याय १२

दर्शन की उत्कण्ठा वाले वे सब हमारे आगमन की कामना से टकटकी लगाकर हमारा ही चिन्तन करते होंगे ॥ ३१ ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार कहते हुए देवेश श्रीकृष्ण के गमन को जानकर पाण्डु-पुत्र किस प्रकार गद्‌गद कण्ठ से बोले ॥ ३२ ॥

जिस प्रकार जल में रहने वालों का जीवन जल है उसी तरह हम लोगों के जीवन तो आप ही हैं। हे जनार्दन! थोड़े ही दिनों के बाद फिर दर्शन हों ॥ ३३ ॥

सर्वे तेऽनिमिषैर्नेत्रैर्मदागमनकाङ्‌क्षिणः ॥ मामेव चिन्तयन्त्येवं मद्दर्शनसमुत्सुकाः ॥ ३१ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इत्युक्तवन्तं देवेशं कथञ्चिपाण्डुनन्दनाः ॥ हरिप्रयाणमालक्ष्य तमूचुर्गद्गदाक्षरम्‌ ॥ ३२ ॥

जीवनं नो भवानेव यथा वारि जलौकसाम्‌ ॥ पुनर्दर्शनमल्पेन कालेनाऽस्तु जनार्दन ॥ ३३ ॥

पाण्डवानां हरिर्नाथो नान्यः कश्चिज्जगत्त्रये ॥ इत्थं सर्वे वदन्त्यद्धा तस्मान्नः पाहि सर्वदा ॥ ३४ ॥

न विस्मार्या वयं सर्वे त्वदीया जगदीश्वर ॥ अस्मच्चेतो मिलिन्दानां जीवनं त्वत्पदाम्बुजम्‌ ॥ ३५ ॥

मुहुर्मुहुः प्रार्थयामो भवानेवावलम्बनम्‌ ॥ असकृत्पाण्डुपुत्रेषु गृणत्स्वेवं यदूद्वहः ॥ ३६ ॥

पाण्डवों के नाथ हरि हैं और तीनों लोको में दूसरा कोई नहीं है, इस प्रकार सामने ही सब लोग कहते हैं अतः हम लोगों की हमेशा रक्षा करें ॥ ३४ ॥

हे जगदीश्वमर! हम लोग आप के हैं, भूलियेगा नहीं। हम लोगों के चित्तरूपी भ्रमरों का जीवन आपका चरण कमल ही है ॥ ३५ ॥

आप ही हमारे आधार हैं, इसलिए बारम्बार हम सब प्रार्थना करते हैं। इन पाण्डुपुत्रों के निरन्तर इस तरह कहते रहने पर श्रीकृष्णचन्द्र ॥ ३६ ॥

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