अध्याय १२

प्रेमानन्द में मग्न होकर धीरे-धीरे रथ पर सवार होकर पीछे चलने वाले पाण्डुपुत्रों को लौटाकर द्वारका पुरी को गये ॥ ३७ ॥

श्रीनारायण बोले – इसके बाद श्रीद्वारकानाथ श्रीकृष्णचन्द्र के द्वारका पुरी जाने पर, राजा युधिष्ठिर अपने छोटे भाइयों के साथ तप करते हुए तीर्थों मे भ्रमण करते भये ॥ ३८ ॥

हे ब्रह्मन्‌! नारद! भगवान्‌ के प्रिय पुरुषोत्तम मास में मन लगाकर और श्रीकृष्णचन्द्र के वचनों का स्मरण करते हुए, अपने छोटे भाइयों से तथा द्रौपदी से राजा युधिष्ठिर बोले – ॥ ३९ ॥

मन्दं मन्दं समारुह्य रथं प्रेमपरिप्लुतः ॥ ययौ द्वारवतीमेतान्‌ परावृत्यानुगच्छतः ॥ ३७ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ अथ श्रीद्वारकानाथे गते द्वारवतीं तदा ॥ राजापि सानुजस्तप्यंस्तीर्थानि विचचार ह ॥ ३८ ॥

पुरुषोत्तमे मनः कृत्वा ब्रह्मन्‌ श्रीभगवत्प्रिये ॥ अनुजानीहि कृष्णां च विष्वक्‌सेनवचः स्मरन्‌ ॥ ३९ ॥

अहो श्रुतमतीवोग्रं माहात्म्यं पौरुषोत्तमम्‌ ॥ कथं सुखानि लभ्यन्ते नाभ्यर्च्य पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ४० ॥

स धन्यो भारते वर्षे स पूज्यः श्रेष्ठ एव सः ॥ विविधैर्नियमैर्यस्तु पूजयेत्पुरुषोत्तमम्‌ ॥ ४१ ॥

एवं सर्वेषु तीर्थेषु भ्रमन्तः पाण्डुनन्दनाः ॥ पुरुषोत्तममासाद्य व्रतं चेरुर्विधानतः ॥ ४२ ॥

अहो! पुरुषोत्तम मास में होने वाले अत्यन्त उग्र पुरुषोत्तम का माहात्म्य सुना है, पुरुषोत्तम भगवान्‌ के पूजन किये बिना सुख किस तरह मिलेगा? ॥ ४० ॥

इस भारतवर्ष में वह धन्य है, वह पूज्य है, वही श्रेष्ठ है, जो अनेक प्रकार के नियमों से पुरुषोत्तम भगवान्‌ का पूजनार्चन किया करता है ॥ ४१ ॥

इस तरह समस्त तीर्थों में भ्रमण करते हुए पाण्डुपुत्र पुरुषोत्तम मास के आने पर विधिपूर्वक व्रत करते भये ॥ ४२ ॥

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