अध्याय १२

हे मुने! नारद! व्रत के अन्त में चौदह वर्ष के पूर्ण होने पर श्रीकृष्ण भगवान्‌ की कृपा से अतुल निष्कण्टक राज्य को प्राप्त किये ॥ ४३ ॥

पूर्वकाल में सूर्यवंश में होने वाला दृढ़धन्वा नाम का राजा पुरुषोत्तम मास के सेवन से बड़ी लक्ष्मी ॥ ४४ ॥

पुत्र पौत्र का सुख और अनेक प्रकार के भोगों को भोगकर, योगियों को भी दुर्लभ जो भगवान्‌ का वैकुण्ठ लोक है वहाँ गया ॥ ४५ ॥

तदन्ते राज्यमतुलमवापुर्गतकण्टकम्‌ ॥ पूर्णे चतुर्दशे वर्षे श्रीकृष्णकृपया मुने ॥ ४३ ॥

दृढधन्वा नृपः पूर्वं सूर्यवंशसमुद्भवः ॥ पुरुषोत्तममासस्य सेवनान्महतों श्रियम्‌ ॥ ४४ ॥

पुत्रपौत्रसुखं चैव भुक्त्वां भोगाननेकशः ॥ जगाम भगवल्लोकमगम्यं योगिनामपि ॥ ४५ ॥

एतन्मासस्य माहात्म्यमतुलं मुनिसत्तम ॥ नाहं वक्तुंः समर्थोऽस्मि कल्पकोटिशतैरपि ॥ ४६ ॥

सूत उवाच ॥ पुरुषोत्तममासस्य कृष्णद्वैपायनादहम्‌ ॥ माहात्म्यं श्रुतवान्‌ विप्रा वक्तुंक तदपि न प्रभुः ॥ ४७ ॥

अस्य माहात्म्यमखिलं वेत्ति नारायणः स्वयम्‌ ॥ अथवा भगवान्‌ साक्षाद्वैकुण्ठनिलया हरिः ॥ ४८ ॥

हे मुनिश्रेष्ठ! नारद! इस पुरुषोत्तम मास के अतुल माहात्य को करोड़ों कल्प समय मिलने पर भी मैं कहने को समर्थ नहीं हूँ ॥ ४६ ॥

सूतजी बोले – हे विप्र लोग! पुरुषोत्तम मास का माहात्म्य कृष्णद्वैपायन (व्यास जी) से मैंने सुना है तथापि कहने को मैं समर्थ नहीं हूँ ॥ ४७ ॥

इस पुरुषोत्तम मास के अखिल माहात्म्य को स्वयं नारायण जानते हैं या साक्षात्‌ वैकुण्ठवासी हरि भगवान्‌ जानते हैं ॥ ४८ ॥

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