अध्याय १३

श्रीनारायण बोले – हे ब्रह्मन्‌! नारद! सुनिये। मैं पवित्र करने वाली गंगा के समान राजा दृढ़धन्वा की सुन्दर तथा प्राचीन कथा कहूँगा ॥ ७ ॥

हैहय देश का रक्षक, श्रीमान्‌ बुद्धिमान्‌ तथा सत्यपराक्रमी चित्रधर्मा नाम का राजा भया ॥ ८ ॥

उसको दृढ़धन्वा नाम से प्रसिद्ध अति तेजस्वी, सब गुणों से युक्त, सत्य बोलने वाला, धर्मात्मा और पवित्र आचरण वाला पुत्र हुआ ॥ ९ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ श्रृणु राजन्‌ प्रवक्ष्येऽहं भूपस्य दृढधन्वनः ॥ कथां पुरातनीं रम्यां स्वर्धुनीमिव पावनीम्‌ ॥ ७ ॥

आसीद्धैहयदेशस्य गोप्ता श्रीमान्‌ महीपतिः ॥ चित्रधर्मेति विख्यातो धीमान्‌ सत्यपराक्रमः ॥ ८ ॥

तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी दृढधन्वेति विश्रुतः ॥ स सर्वगुणसम्पन्नः सत्यवाग्धार्मिकः शुचिः ॥ ९ ॥

आकर्णान्तविशालाक्षः पृथुवक्षा महाभुजः ॥ अवर्धत महातेजाः सार्धं गुणगणैरसौ ॥ १० ॥

अधीत्य साङ्गान्निगमांश्चतुरश्चतुरो मुदा ॥ सकृन्निगदमात्रेण प्रागधीतानिव स्फुटम्‌ ॥ ११ ॥

दक्षिणां गुरवे दत्त्वा सम्पूज्य विधिवच्च तम्‌ ॥ गुरोरनुज्ञया धीमान्‌ पितुः पुरमजीगमत्‌ ॥ १२ ॥

कान तक लंबे नेत्र वाला, चौड़ी छाती वाला, बड़ी भुजा वाला, महातेजस्वी वह राजा दृढ़धन्वा प्रशस्त गुण समूहों के साथ-साथ बढ़ता भया ॥ १० ॥

वह चतुर राजा दृढ़धन्वा प्रसन्नता के साथ गुरु के मुख से एक बार कहने मात्र से पूर्व में पढ़े हुये के समान व्याकरण आदि छः अंगों के साथ चार वेदों का अध्ययन कर ॥ ११ ॥

गुरु को दक्षिणा देकर और विधि पूर्वक उनकी पूजा कर बिद्धिमान्‌ राजा गुरु की आज्ञा से पिता चित्रधर्मा के पुर को गया ॥ १२ ॥

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