अध्याय १३

अपने नगर में वास करने वाले प्रजावर्ग के नेत्रों को आनन्दित करता हुआ। जिस पुत्र को देख कर राजा चित्रधर्मा भी अत्यन्त हर्ष को प्राप्त हुआ ॥ १३ ॥

पुत्र जवान हो, सम्पूर्ण धर्म को जानने वाला हो और प्रजापालन में समर्थ हो, इससे बढ़ कर सारशून्य इस संसार में और क्या है? अर्थात्‌ कुछ नहीं है ॥ १४ ॥

अब मैं दो भुजावाले, मुरली (वंशी) को धारण करने वाले, प्रसन्न मुख वाले, शान्त तथा भक्तों को अभय देनेवाले श्रीकृष्णचन्द्र की आराधना करता हूँ ॥ १५ ॥

जनयन्नयनानन्दं निजपत्तनवासिनाम्‌ ॥ चित्रधर्माऽपि तं पुत्रं दृष्ट्वा लेभे परां मुदम्‌ ॥ १३ ॥

युवानं सर्वधर्मज्ञं प्रजानां पालने क्षमम्‌ ॥ अतः परं किमत्रास्ति संसारे सारवर्जिते ॥ १४ ॥

आराधयामि श्रीकृष्णं द्विभुजं मुरलीधरम्‌ ॥ प्रसन्नवदनं शान्तं भक्तानामभयप्रदम्‌ ॥ १५ ॥

ध्रुवाम्बरीषशर्यातिययातिप्रमुखा नृपाः ॥ शिविश्च रन्तिदेवश्च शशबिन्दुर्भगीरथः ॥ १६ ॥

भीष्मश्च विदुरश्चैव दुष्यन्तो भरतोऽपि वा ॥ पृथुरुत्तानपादश्च प्रह्लादोऽथ विभीषणः ॥ १७ ॥

एते चान्ये च राजानस्त्यक्त्वा  भोगाननेकशः ॥ अध्रुवेण ध्रुवं प्राप्ता आराध्य पुरुषोत्तमम्‌ ॥ १८ ॥

जिस तरह ध्रुव, अम्बरीष, शर्धाति, ययाति प्रमुख राजा और शिवि, रन्तिदेव, शशबिन्दु, भगीरथ ॥ १६ ॥

भीष्म, विदुर, दुष्यन्त और भरत, पृथु, उत्तानपाद, प्रह्‌लाद, विभीषण ॥ १७ ॥

ये सब राजा तथा और अन्य राजा लोग भी अनेकों लोगों को त्याग कर, इस अनित्य शरीर से पुरुषोत्तम भगवान्‌ का आराधन कर, नित्य (सदा रहनेवाले) विष्णुपद को चले गये ॥ १८ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10