अध्याय १३

उसी तरह स्त्री, मकान पुत्र आदि में स्नेहमय बन्धन को तोड़कर वन में जाकर हरि का सेवन करना हमारा भी कर्तव्य है ॥ १९ ॥

ऐसा मन में निश्चय कर, समर्थ राजा दृढ़धन्वा को राज्य का भार देकर स्वयं विरक्त हो, शीघ्र पुलह ऋषि के आश्रम को चला गया ॥ २० ॥

वहाँ जाकर सम्पूर्ण कामनाओं से निस्पृह हो और भोजन त्याग कर हर समय मन से श्रीकृष्णचन्द्र का स्मरण करता हुआ तप करने लगा ॥ २१ ॥

अतो मयापि कर्तव्यमरण्ये हरिसेवनम्‌ ॥ छित्त्वा स्नेहमयं पाशं दारागारसुतादिषु ॥ १९ ॥

इति निश्चित्य मनसा समर्थे दृढधन्वनि ॥ धुरं न्यस्य जगामाशु विरक्तः पुलहाश्रमम्‌ ॥ २० ॥

तत्र गत्वा तपस्तेपे श्रीकृष्णं मनसा स्मरन्‌ ॥ निस्पृहः सर्वकामेभ्यो निराहारो निरन्तरम्‌ ॥ २१ ॥

कियत्कालं तपस्तप्त्वा हरेर्धाम जगाम सः ॥ दृढधन्वापि शुश्राव स्वपितुर्वैष्णवीं गतिम्‌ ॥ २२ ॥

हर्षशोकसमाविष्टो ह्यकरोदौर्ध्वदेहिकम्‌ ॥ पितृभक्त्या  महीपालो विद्वज्जनवचः स्थितः ॥ २३ ॥

पुष्करावर्तके पुण्ये नगरेऽत्यन्तशोभिते ॥ राज्यं चकार भूपालो नीतिशास्त्रविशारदः ॥ २४ ॥

कुछ समय तक तप करके वह राजा चित्रवर्मा हरि भगवान्‌ के परम धाम को चला गया। राजा दृढ़धन्वा ने भी अपने पिता की वैष्णवी गति को सुना ॥ २२ ॥

उस समय पिता के परमधाम गमन से हर्ष और वियोग होने से शोक-युक्त राजा दृढ़धन्वा पितृ-भक्ति से विद्वानों के वचन में स्थित होकर, पारलौकिक क्रिया को करता भया ॥ २३ ॥

नीतिशास्त्र में विशारद (चतुर) राजा  दृढ़धन्वा अत्यन्त शोभित पवित्र पुष्करावर्तक नगर में राज्य करने लगा ॥ २४ ॥

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