अध्याय १३

अच्छे स्वभाववाली विदर्भराज की कन्या उसकी स्त्री गुणसुन्दरी नाम की थी, पृथ्वी पर रूप में उसके समान दूसरी स्त्री नहीं थी ॥ २५ ॥

उस गुणसुन्दरी ने सुन्दर, चतुर, शुभ आचरण वाले चार पुत्रों को उत्पन्न किया और सम्पूर्ण लक्षणों से युक्त चारुमती नामक कन्या को उत्पन्न किया ॥ २६ ॥

चित्रवाक्‌, चित्रवाह, मणिमान्‌ और चित्रकुण्डल नाम वाले वे सब बड़े मानी, शूर अपने-अपने नाम से पृथक्‌ विख्यात होते भये ॥ २७ ॥

तस्य शीलवती भार्या नाम्ना या गुणसुन्दरी ॥ विदर्भराजतनया रूपेणाप्रतिमा भुवि ॥ २५ ॥

पुत्रान्‌ सा सुषुवे दिव्यांश्चतुरश्चतुराञ्छुभान्‌ ॥ पुत्रीं चारुमतीं नाम सर्वलक्षणसंयुताम्‌ ॥ २६ ॥

चित्रवाक्‌ चित्रवाहश्च मणिमांश्चित्रकुण्डलः ॥ सर्वे ते मानिनः शूरा विख्याता नामभिः पृथक्‌ ॥ २७ ॥

दृढधन्वा गु्णैः ख्यातः शान्तो दान्तो दृढव्रतः ॥ रूपवान्‌ गुणवाञ्छूरः श्रीमान्‌ प्रकृतिसुन्दरः ॥ २८ ॥

वेदवेदाङ्गविद्वाग्मी धनुर्विद्याविशारदः ॥ सुनिर्जितारिषड्‌वर्गः शत्रुसङ्घविदारणः ॥ २९ ॥

क्षमया पृथिवीतुल्यो गाम्भीर्ये सागरोपमः ॥ पितामहसमः साम्ये प्रसादे गिरिशोपमः ॥ ३० ॥

राजा दृढ़धन्वा गुणों करके प्रसिद्ध, शान्त, दान्त, दृढ़प्रतिज्ञ, रूपवान्‌, गुणवान्‌, वीर, श्रीमान्‌, स्वभाव से सुन्दर ॥ २८ ॥

चार वेद और व्याकरण आदि ६ अंगों को जानने वाला, वाग्मी (वाक्‌चतुर), धनुर्विद्या में निपुण, अरिषड्‌वर्ग (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य) को जीतने वाला, और शत्रु-समुदाय का नाश करने वाला ॥ २९ ॥

क्षमा में पृथिवी के समान, गम्भीरता में समुद्र के समान, समता (सम व्यवहार) में पितामह (ब्रह्मा) के समान, प्रसन्नता में शंकर के समान ॥ ३० ॥

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