अध्याय १३

एकपत्नी व्रत (एक ही स्त्री से विवाह करने का व्रत) को करने वाले दूसरे रामचन्द्र के समान, अत्यन्त उग्र पराक्रमशाली दूसरे कार्तवीर्य (सहस्रार्जुन) के समान था ॥ ३१ ॥

नारायण बोले – एक समय रात्रि में शयन किये हुए उस राजा दृढ़धन्वा को चिन्ता हुई कि अहो! यह वैभव (सम्पत्ति) किस महान्‌ पुण्य के कारण हमें प्राप्त हुआ है ॥ ३२ ॥

न तो मैंने तप किया, न तो दान दिया, न तो कहीं पर कुछ हवन ही किया। मैं इस भाग्योदय का कारण किससे पूछूँ ॥ ३३ ॥

एकपत्नींव्रतधरो रघुनाथ इवापरः ॥ अत्युग्रवीर्यः सद्धर्मी कार्तवीर्य इवापरः ॥ ३१ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ एकदा निशि सुप्तस्य चिन्ताऽऽसीत्तस्य भूपतेः ॥ अहोऽयं वैभवः केन पुण्येन महताऽभवत्‌ ॥ ३२ ॥

न मया च तपस्तप्तं  न दत्तं न हुतं क्कचित्‌ ॥ कमिदं परिपृच्छामि मम भाग्यस्य कारणम्‌ ॥ ३३ ॥

एवं चिन्तयतस्तस्य रजनी विरतिं गता ॥ ब्राह्मे मुहूर्ते उत्थाय स्नानं कृत्वा यथाविधि ॥ ३४ ॥

उपस्थायार्कमुद्यन्तं सन्तर्प्य भगवत्कलाः ॥ दत्त्वा दानानि विप्रेभ्यो नमस्कृत्वाऽश्वमारुहत्‌ ॥ ३५ ॥

ततोऽरण्यं जगामाशु मृगयासक्तमानसः ॥ मृगान्‌ वराहान्‌ शार्दूलाञ्जघान गवयान्बहून्‌ ॥ ३६ ॥

इस प्रकार चिन्ता करते ही राजा दृढ़धन्वा की रात्रि बीत गई। प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त में उठकर विधिपूर्वक स्नान कर ॥ ३४ ॥

उदय को प्राप्त सूर्यनारायण का उपस्थान कर, भगवान्‌ की कला की पूजा कर अर्थात्‌ देवमन्दिरों में जाकर देवता का पूजन कर, ब्राह्मणों को दान देकर तथा नमस्कार करके घोड़े पर सवार हो गया ॥ ३५ ॥

उसके बाद शिकार खेलने की इच्छा से शीघ्र वन को गया वहाँ पर बहुत से मृग, वराह (सूअर), सिंह और गवयों (चँवरी गाय) का शिकार किया ॥ ३६ ॥

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