अध्याय १३

उसी समय राजा दृढ़धन्वा के बाण से घायल होकर कोई मृग बाण सहित शीघ्र एक वन से दूसरे वन को चला गया ॥ ३७ ॥

रुधिर गिरे हुए मार्ग से राजा भी मृग के पीछे गया। परन्तु मृग कहीं झाड़ी में छिप गया और राजा उस वन में उसे खोजता ही रह गया ॥ ३८ ॥

पिपासा से व्याकुल उस राजा ने समुद्र के समान एक तालाब को देखा वहाँ जल्दी से जाकर और पानी पीकर तीर पर चला आया ॥ ३९ ॥

कश्चिन्मृगो हतोऽरण्ये बाणेन दृढधन्वना ॥ वनाद्वनान्तरं यातो बाणमादय सत्वरम्‌ ॥ ३७ ॥

शोणितस्रुतिमार्गेण राजाऽप्यनुययौ मृगम्‌ ॥ मृगः कुत्रापि संलीनो राजा बभ्राम तद्वनम्‌ ॥ ३८ ॥

तृषाक्रान्तः स कासारं ददर्श सागरोपमम्‌ ॥ तत्र गत्वाशु पीत्वाऽसौ पानीयं तीरमागतः ॥ ३९ ॥

ततो ददर्श न्यग्रोधं घनच्छायं महातरुम्‌ ॥ तज्जटायां निबद्धयाश्वं  निषसाद महीपतिः ॥ ४० ॥

तत्रागमत्‌ खगः कश्चित्‌ कीरः परमशोभनः ॥ मानुषीमीरयन्‌ वाणीमतुलां नृपमोहिनीम्‌ ॥ ४१ ॥

शुकः पपाठ सुश्लो कमेकमेव पुनः पुनः ॥ सम्बोध्य दृढधन्वानमेकाकिनमुपस्थितम्‌ ॥ ४२ ॥

वहाँ घनी छाया वाले एक विशाल बट वृक्ष को देखा। उस वृक्ष की जटा में घोड़े को बाँधकर राजा वहीं बैठ गया ॥ ४० ॥

उसी समय वहाँ पर कोई एक परम सुन्दर सुग्गा राजा को मोहित करने वाली तुलना रहित मनुष्य वाणी को बोलता हुआ आया ॥ ४१ ॥

केवल राजा को बैठे देख उसको सम्बोधित करता हुआ एक ही श्लोमक को बार-बार पढ़ने लगा ॥ ४२ ॥

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