अध्याय १३

कि इस पृथिवी पर विद्यमान अतुल सुख को देखकर तू तत्त्व (आत्मा) का चिन्तन नहीं करता है तो इस संसार के पार को कैसे जायगा? ॥ ४३ ॥

बार-बार इस श्लोनक को राजा दृढ़धन्वा के सामने पढ़ने लगा। राजा उसके वचन को सुनकर प्रसन्न हुआ और उसपर मोहित हो गया ॥ ४४ ॥

कि इस शुक पक्षी ने दुःख से जानने योग्य, सार भरे हुए नारिकेल फल के समान अगम्य एक ही श्लोहक को बार-बार पढ़ते हुए क्या कहा? ॥ ४५ ॥

विद्यमानातुलसुखमालोक्यातीव भूतले ॥ न चिन्तयसि तत्त्वं त्वं तत्कथं पारमेष्यसि ॥ ४३ ॥

वारं वारमिदं पद्यं पपाठ नृपतेः पुरः ॥ श्रुत्वा तस्य वचो राजा मुमुहे मुमुदेऽपि च ॥ ४४ ॥

किमेतदुक्तवान्‌ कीर एकं पद्यं पुनः पुनः ॥ नारिकेलमिवागम्यं दुर्बोधं सारसम्भृतम्‌ ॥ ४५ ॥

किं वा नायं भवेत्‌ कृष्णद्वैपायनसुतः परः ॥ श्रीकृष्णसेवकं मूढं मग्नं संसारसागरे ॥ ४६ ॥

विष्णुरातमिवोद्धर्तुं कृपया मां समागतः ॥ इति चिन्तयतस्तस्य तत्सेना समुपागता ॥ ४७ ॥

कीरस्त्वदर्शनं प्राप्तो बोधयित्वा नराधिपम्‌ ॥ राजा स्वपुरमागत्य कीरवाक्यमनुस्मरन्‌ ॥ ४८ ॥

क्या यह कृष्णद्वैपायन (वेदव्यास) के श्रेष्ठ पुत्र शुकदेवजी तो नहीं हैं? जो कि श्रीकृष्णचन्द्र के सेवक मुझको मूढ़ और संसार सागर में डूबा हुआ देखकर ॥ ४६ ॥

राजा परीक्षित के समान कृपा कर उद्धार करने की इच्छा से मेरे पास आये हैं? इस तरह चिन्ता करते हुए राजा दृढ़धन्वा की सेना समीप आ गई ॥ ४७ ॥

शुक पक्षी राजा को उपदेश देकर स्वयं अन्तर्धान (अलक्षित) हो गया। उस शुकपक्षी के वचन को स्मरण करता हुआ राजा अपने पुर में आकर ॥ ४८ ॥

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