अध्याय १३

बुलाने पर भी नहीं बोलता है और निद्रा रहित हो उसने भोजन को भी त्याग दिया था, तब एकान्त में उसकी रानी ने आकर राजा से पूछा ॥ ४९ ॥

गुणसुन्दरी बोली – हे पुरुषों में श्रेष्ठ! यह मन में मलिनता क्यों हुई? हे भूपाल! पृथिवी के रक्षक! उठिये उठिये। भोगों को भोगिये और वचन बोलिए ॥ ५० ॥

वाच्यमानोऽपि नावोचद्विनिद्रस्त्यक्तभोजनः ॥ राज्ञी रहः समागत्य राजानं पर्यपृच्छत ॥ ४९ ॥

गुणसुन्दर्युवाच भो भो पुरुषशार्दूल दौर्मनस्यमिदं कुतः ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भूपाल भुङ्क्ष्व भोगान्‌ वचो वद ॥ ५० ॥

एवं स्त्रियाऽनुनीतोऽपि न किञ्चिदवदन्नृपः ॥ स्मरन्‌ शुकवचस्तथ्यं दुर्ज्ञेयममरैरपि ॥ ५१ ॥

साऽपि बाला विनिःश्वस्य भर्तृदुःखातिपीडिता ॥ न बुबोध निजस्वामिचिन्ताकारणमुत्कटम्‌ ॥ ५२ ॥

देवताओं से भी दुःख से जानने योग्य उस शुक पक्षी के सत्य वचन का स्मरण करता हुआ रानी गुणसुन्दरी के प्रार्थना करने पर भी राजा दृढ़धन्वा कुछ नहीं बोला ॥ ५१ ॥

पति के दुःख से अत्यन्त पीड़ित वह रानी भी दीर्घ स्वाँस लेकर अपने स्वामी की चिन्ता के उत्कट कारण को नहीं जान सकी ॥ ५२ ॥

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