अध्याय १४

श्रीनारायणजी बोले – इसके बाद चिन्ता से आतुर राजा दृढ़धन्वा के घर बाल्मीकि मुनि आये जिन्होंने परम अद्भुत तथा सुन्दर रामचन्द्रजी का चरित्र वर्णन किया है ॥ १ ॥

राजा दृढ़धन्वा ने दूर से ही बाल्मीकि मुनि को आते हुए देखकर घबड़ाहट के साथ जल्दी से उठकर भक्तियुक्त हो उनके चरणों में दण्डवत्‌ प्रणाम किया ॥ २ ॥

भलीभाँति पूजा कर उत्तम आसन पर ऋषि को बैठाकर उनके चरणों को गोद में लेकर दोनों हाथों से धोया ॥ ३ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ अथ चिन्तातुरस्यास्य गृहं बाल्मीकिराययौ ॥ यो रामचरितं दिव्यं चकार परमाद्भुतम्‌ ॥ १ ॥

दूरादालोक्य भूपालः समुत्थाय ससम्भ्रमम्‌ ॥ अनीनमत्तच्चरणौ दण्डवद्भक्तिसंयुतः ॥ २ ॥

सम्पूज्य स्थापयामास तमृषिं परमासने ॥ पादावङ्कगतौ कृत्वा कराभ्यां समलालयत्‌ ॥ ३ ॥

पादावनेजनीरापः शिरसा धारयन्मुदा ॥ उवाच स्निग्धया वाचा स्मरन्‌ कीरवचो नृपः ॥ ४ ॥

दृढधन्वोवाच ॥ भगवन्‌ कृतकृत्योऽहं भाग्यवानस्मि साम्प्रतम्‌ ॥ अद्य मे सफलं जन्म ह्यद्यार्थोऽधिगतः प्रभो ॥ ५ ॥

श्रुतं मे सफलं जातं यद्भवानक्षिगोचरः ॥ किं वर्ण्यं मे महद्भाग्यं जगत्पावनपावन ॥ ६ ॥

और उस चरणोदक को बड़े हर्ष के साथ शिर से धारण कर शुक पक्षी की बात स्मरण करता हुआ राजा दृढ़धन्वा ने मधुर वचन से यों कहा ॥ ४ ॥

दृढ़धन्वा बोला – हे भगवन्‌! इस समय मैं कृतकृत्य हूँ। भाग्यवान हूँ। मेरा जन्म सफल हुआ। हे प्रभो! आज मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥

आज आप के प्रत्यक्ष दर्शन से शास्त्रादिकों के यथार्थ अर्थ का ज्ञान सफल हुआ। हे जगत्‌ के पावन करने वालों के पावन करने वाले! आज मैं अपने भाग्य का क्या वर्णन करूँ? ॥ ६ ॥

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