अध्याय १४

श्रीनारायण बोले – इस तरह बाल्मीकि मुनि को कहकर वह राजा मौन हो गये, बाद बाल्मीकि मुनि उस राजा को विनययुक्त देखकर ॥ ७ ॥

बड़े प्रसन्न हुए और जनता को आनंदित करते हुए बोले। बाल्मीकि मुनि बोले – हे नृपश्रेष्ठ! ठीक है, ठीक है, तुम में उक्त प्रकार की सब बातों का होना सम्भव है ॥ ८ ॥

हे राजन्‌! तुम चिंता से आतुर क्यों हो? सो सब मन की बात कहो। ऐसा मालूम पड़ता है कि तुम्हारी कुछ कहने की इच्छा है, इसलिये हे महामते! उसे कहो ॥ ९ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इत्युक्त्वा  मुनिशार्दूलं विरराम स भूपतिः ॥ बाल्मीकिरपि तं दृष्ट्वा राजानं विनयान्वितम्‌ ॥ ७ ॥

उवाच परमप्रीतो हर्षयन्‌ जनतां मुनिः ॥ बाल्मीकिरुवाच ॥ साधु साधु नृपश्रेष्ठ त्वय्येतदुपपद्यते ॥ ८ ॥

चिन्तातुरः कथं राजन्‌ वद सर्वं मनोगतम्‌ ॥ किञ्चिद्वक्तुं  स्पृहा तेऽस्ति तद्वदस्व महामते ॥ ९ ॥

दृढधन्वोवाच ॥ भवदीयपदाम्भोजकृपया मे सुखं सदा ॥ परन्त्वेको महान्‌ विद्वन्‌ सन्देहो हृदये मम ॥ १० ॥

तमपाकुरु शल्यं त्वं वन्यकीरमुखोद्गतम्‌ ॥ कदाचिन्मृगयाकामो गतोऽहं गहने वने ॥ ११ ॥

भ्रमन्नपश्यं कासारं तत्र पीतं जलं मया ॥ श्रमापनोदनाकाङ्क्षी महान्यग्रोधमाश्रितः ॥ १२ ॥

राजा दृढ़धन्वा बोला – आपके चरणकमल की कृपा से हमेशा सुख है। परन्तु हे विद्वन्‌! हमारे हृदय में एक बड़ा सन्देह है ॥ १० ॥

वन में होने वाले शुक पक्षी के मुख से निकले हुए बाण के समान उस वचन को दूर करें। किसी समय मैं शिकार खेलने के लिये गहन वन में निकल गया ॥ ११ ॥

वहाँ भ्रमण करता हुआ एक तालाब देखा, उसका जल पीया, बाद में थकावट दूर करने के लिये एक बड़े वटवृक्ष के नीचे बैठ गया ॥ १२ ॥

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