अध्याय १४

यह सब विचार कर संक्षेप में कहने के आप योग्य हैं। राजा दृढ़धन्वा के वचन को बाल्मीकि मुनि सुनकर ॥ १९ ॥

प्राणायाम कर, एक मुहूर्त तक ध्यान मैं मग्न हो, हाथ में रखे हुये आँवला के फल के समान विश्वा संसार के भूत, भविष्यत्‌ और जो वर्तमान विषयं हैं ॥ २० ॥

उनको हृदय में समाधि के बल से जानकर और निश्चिय कर राजा से बोले। बाल्मीकि मुनि बोले – हे राजाओं में श्रेष्ठ! अपने पूर्वजन्म का चरित्र तुम सुनो ॥ २१ ॥

एतत्सर्वं समासेन विचार्य वक्तुजमर्हसि ॥ श्रुत्वा वाक्यानि भूपस्य बाल्मीकिर्मुनिसत्तमः ॥ १९ ॥

प्राणायामपरो भूत्वा मुहूर्तं ध्यानमास्थितः ॥ करामलकवद्विश्वंत भूतं भव्यं भवच्च यत्‌ ॥ २० ॥

विलोक्य हृदि निश्चि त्य राजानं प्रत्युवाच सः ॥ बाल्मीकिरुवाच ॥ श्रृणु भूपतिशार्दूल प्राग्जन्मचरितं तव ॥ २१ ॥

पुरा जन्मनि राजेन्द्र भवान्‌ द्रविडदेशजः ॥ द्विजः कश्चित्‌ सुदेवाख्यस्ताम्रपर्णी तटै वसन्‌ ॥ २२ ॥

धार्मिकः सत्यवादी च यथालाभेन तोषवान्‌ ॥ वेदाध्ययनसम्पन्नो विष्णुभक्तिपरायणः ॥ २३ ॥

अग्निहोत्रादियागैश्च तोषयामास तं हरिम्‌ ॥ सदैवं वर्तमानस्य भार्याऽऽसीद्वरवर्णिनी ॥ २४ ॥

हे राजेन्द्र! पूर्वजन्म में आप द्रविड़ देश में ताम्रपर्णी नदी के किनारे वास करने वाले सुदेव नामक ब्राह्मण थे ॥ २२ ॥

धार्मिक, सत्यवादी, जो मिल जाय। उतने ही में सन्तोष करने वाले, वेधाध्ययन में सम्पन्न, विष्णु भक्ति में परायण रहा करते थे ॥ २३ ॥

आपने अग्निहोत्र आदि यज्ञों के द्वारा भगवान्‌ हरि को प्रसन्न किया। इस प्रकार रहते हुये तुम्हारी गुणवती स्त्री थी ॥ २४ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7 8