अध्याय १४

वह गौतम ऋषि की सुन्दर कन्या गौतमी नाम से प्रसिद्ध शंकर की सेवा में तत्पपर पार्वती के समान तुम्हारी प्रेम से सेवा करती थी ॥ २५ ॥

गृहस्थाश्रम धर्म में धर्मपूर्वक वास करते बहुत समय बीत गया! परन्तु तुमको सन्तति नहीं हुई ॥ २६ ॥

एक दिन अपने स्त्री से सेवित आसन पर बैठा हुआ दुःखित ब्राह्मण गद्‌गद स्वर से बोला ॥ २७ ॥

गौतमीति सुविख्याता गौतमस्यसुताशुभा ॥ पतिं पर्यचरत्‌ प्रेम्णा भवानीव भव प्रभुम्‌ ॥ २५ ॥

गृहमेधविधौ तस्य वर्त्तमानस्य धर्मतः ॥ व्यतीतः सुमहान्‌ कालः प्रापासौ सन्ततिं न हि ॥ २६ ॥

एकदाऽऽसनसंविष्टः सेव्यमानः स्वकान्तया ॥ उवाच वचनं विप्रो विषण्‍‍णो गद्‌गदाक्षरम्‌ ॥ २७ ॥

अयि सुन्दरि संसारे सुखं नास्ति सुतात्परम्‌ ॥ लोकान्तर सुखं पुण्यं तपोदानसमुद्भवम्‌ ॥ २८ ॥

सन्ततिः शुद्धवंश्या हि परत्रेह च शर्मणे ॥ तमप्राप्य वरं पुत्रं जीवितं मम निष्फलम्‌ ॥ २९ ॥

न लालितो मया पुत्रो वेदार्थो न प्रबोधितः ॥ नोद्वाहश्चर कृतस्तस्य वृथा जन्म गतं मम ॥ ३० ॥

अयि सुन्दरि! संसार में पुत्र से बढ़ कर दूसरा सुख नहीं है और तप दान से उत्पन्न पुण्य दूसरे लोक में सुख देने वाला होता है ॥ २८ ॥

शुद्ध वंश में होने वाली सन्तति इस लोक में तथा परलोक में कल्याण करने वाली होती है, उस श्रेष्ठ पुत्र के न मिलने से मेरा जीवन निष्फल है ॥ २९ ॥

न तो मैंने पुत्र का प्यार किया और न वेद पढ़ने के लिए सोने से जगाया, न तो उसका विवाह किया, इसलिए मेरा जन्म व्यर्थ में चला गया ॥ ३० ॥

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