अध्याय १४

अभी मेरी मृत्यु हो, मेरे को आयुष्य प्रिय नहीं है। इस प्रकार अपने प्रिय पति का वचन सुनकर स्त्री गौतमी खिन्न मन हुई ॥ ३१ ॥

बाद धैर्य धारण करती हुई, प्रिय वचन बोलने में चतुर, प्रिय पति के प्रेम में मग्न वह स्त्री अपने पति को समझाने के लिये सुन्दर वचन बोली ॥ ३२ ॥

गौतमी बोली – हे प्राणेश्व॥र! अब इस तरह तुच्छ वचनों को न कहिये। आपके समान भगवद्‌भक्त विद्वान्‌ लोग मोह को प्राप्त नहीं होते हैं ॥ ३३ ॥

सद्यो मे मृतिरेवास्तु न ह्यायुश्‍च प्रियं मम ॥ इत्थं प्रियवचः श्रुत्वा सुन्दरी खिन्नमानसा ॥ ३१ ॥

समाश्वासयितुं धीरा प्रियवाक्यविशारदा ॥ अवीवदद्वचः सौम्यं प्रियप्रेमपरिप्लुता ॥ ३२ ॥

गौतम्युवाच ॥ मा मा प्राणेश्वयर ब्रूहि तुच्छवाक्यानि साम्प्रतम्‌ ॥ भवद्विधा भागवता नैवं मुह्यन्ति सूरयः ॥ ३३ ॥

सत्यधर्मपरोऽसि त्वं जितः स्वर्गस्त्वया विभो ॥ कथं पुत्रैः सुखावाप्तिर्ज्ञानिनस्तव सुव्रत ॥ ३४ ॥

चित्रकेतुः पुरा ब्रह्मन्‌ पुत्रशोकेन तापितः ॥ स नारदेनाङ्गिरसाऽभ्येत्य सन्तारितोऽभवत्‌ ॥ ३५ ॥

तथाङ्गराजा दुष्पुत्राद्वेनाद्वनमगान्निशि ॥ तथा ते सन्ततिः स्वामिन्‌ दुःखदा च भविष्यति ॥ ३६ ॥

हे विभो! आप सत्यधर्म में तत्पर रहनेवाले हो, आपने स्वर्ग को जीत लिया है। हे सुव्रत! अर्थात्‌ हे सुन्दर व्रत करने वाले! आप जैसे ज्ञानी को पुत्रों से सुख की प्राप्ति कैसी? अर्थात्‌ ज्ञानी पुरुष पुत्रों से होने वाले सुख की इच्छा नहीं करते हैं ॥ ३४ ॥

हे ब्रह्मन्‌! पहले चित्रकेतु नामक राजा पुत्र-शोक से सन्तप्त हुआ तब नारद और अंगिरा ऋषि के आने पर पुत्र-शोक से मुक्त हो संसार से उद्धार को प्राप्त हुआ ॥ ३५ ॥

इसी प्रकार राजा अंग वेन नामक दुष्ट पुत्र के कारण रात्रि के समय वन को चला गया। इसी तरह हे स्वामिन्‌! आपको भी सन्ताति दुःख देनेवाली होगी ॥ ३६ ॥

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