अध्याय १४

फिर भी हे तपोधन! यदि आपको सत्‌-पुत्र की लालसा है तो प्रसन्नता से जगत्‌ के नाथ, समस्त अर्थों के दाता, हरि भगवान्‌ की आराधना करें ॥ ३७ ॥

हे ब्रह्मन्‌! पहले सांख्याचार्य कर्दम ऋषि ने जिनकी आराधना कर पुत्र को प्राप्त किया जो कि पुत्र योगियों में श्रेष्ठ कपिल देव नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ ३८ ॥

तथापि तव सत्पुत्रलालसा चेत्तपोधन ॥ आराधय जगन्नाथं हरिं सर्वार्थदं मुदा ॥ ३७ ॥

यमाराध्य पुरा ब्रह्मन्‌ कर्दमः पुत्रमाप्तवान्‌ ॥ सांख्याचार्यस्तु तं देवं कपिलं योगिनां वरम्‌ ॥ ३८ ॥

धर्मपत्न्यार वचश्चेत्थं श्रुत्वा विप्रशिरोमणिः ॥ निश्चित्यैवं तया सार्धं ताम्रपर्णीतटं गतः ॥ ३९ ॥

स्नात्वाऽथ विरजे पुण्ये चचार परमं तपः ॥ शुष्कपर्णजलाहारः पञ्चमे दिने ॥ ४० ॥

चत्वार्यब्दसहस्राणि गतान्येवं तपोनिधेः ॥ तस्यैतत्तपसा ब्रह्मंस्त्रयो लोकाश्चकम्पिरे ॥ ४१ ॥

ब्राह्मण श्रेष्ठ इस प्रकार अपनी धर्मपत्नीत के वचन सुनकर तथा निश्चलय कर उस अपनी गौतमी स्त्री के साथ ताम्रपर्णी नदी के तट पर गया ॥ ३९ ॥

बाद वहाँ जाकर उस पवित्र तीर्थ में स्ना‍न कर अत्यन्त श्रेष्ठ तप करता भया। पाँच-पाँच दिन के बाद सूखे पत्ते तथा जल का आहार करता था ॥ ४० ॥

इस प्रकार तप करते उस तपोनिधि सुदेव ब्राह्मण को चार हजार वर्ष व्यतीत हो गये, हे ब्रह्मन्‌! उसके इस तपस्या से तीनों लोक काँप उठे ॥ ४१ ॥

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