अध्याय १५

हे जगत्‌प्रभो! आपकी स्तुति करने में ब्रह्मादि देवता भी समर्थ नहीं हैं। हे जनार्दन! मैं तो अल्पबुद्धि वाला, मन्द मनुष्य हूँ किस तरह स्तुति करने में समर्थ हो सकता हूँ ॥ ७ ॥

अत्यन्त दुःखी, दीन, अपने भक्त की आप कैसे उपेक्षा (त्याग) करते हो। हे प्रभो! क्या आज संसार में वह आपकी लोकबन्धुता नष्ट हो गई? ॥ ८ ॥

बाल्मीकि ऋषि बोले – सुदेवशर्म्मा ब्राह्मण इस प्रकार विष्णु भगवान्‌ की स्तुति कर हरि के सामने खड़ा हो गया। हरि भगवान्‌ उसके वचन सुनकर मेघ के समान गम्भीर वचन से बोले ॥ ९ ॥

न त्वां ब्रह्मादयो देवाः स्तोतुं शक्ता जगत्प्रभो ॥ कथं मन्दो मनुष्योऽहमल्पबुद्धिर्जनार्दन ॥ ७ ॥

अतिदुःखतरं दीनं त्वद्भक्तं मामुपेक्षसे ॥ तत्कथं लोकबन्धुत्वं प्रभो लोके वृथा गतम्‌ ॥ ८ ॥

बाल्मीकिरुवाच ॥ इत्यभिष्टू्य भूमानं द्विजस्तस्थौ हरेः पुरः ॥ तदाकर्ण्य हरिर्वाक्यमुवाच जलदस्वनः ॥ ९ ॥

श्रीहरिरुवाच ॥ सम्यक्‌ सम्पादितं वत्स यत्त्वया चरितं तपः ॥ किमिच्छसि महाप्राज्ञ तपोधन वदस्व मे ॥ १० ॥

तत्तेऽहं वितरिष्यामि सन्तुष्टस्तपसा तव ॥ एतादृशं महत्कर्म न केनापि कृतं पुरा ॥ ११ ॥

सुदेव उवाच ॥ यदि प्रीतोऽसि हे नाथ दीनबन्धो दयानिधे ॥ तत्पुत्रं देहि मे विष्णो पुराणपुरुषोत्तम ॥ १२ ॥

श्री हरि बोले – हे वत्स! तुमने जो तप किया वह बहुत अच्छी तरह से किया। हे महाप्राज्ञ! हे तपोधन! क्या चाहते हो? सो मुझसे कहो ॥ १० ॥

तुम्हारे तप से प्रसन्न मैं उस वर को तुम्हारे लिये दूँगा क्योंकि आज के पहले ऐसा बड़ा भारी कर्म किसी ने भी नहीं किया है ॥ ११ ॥

सुदेवशर्म्मा बोले – हे नाथ! हे दीनबन्धो! हे दयानिधे! यदि आप प्रसन्न हैं तो हे विष्णो! हे पुराण-पुरुषोत्तम! कृपा कर आप मेरे लिये सत्पुत्र दीजिये ॥ १२ ॥

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