अध्याय १५

हे हरे! पुत्र के बिना सूना यह गृहस्थाश्रम-धर्म मुझको प्रिय नहीं लगता। इस प्रकार हरि भगवान्‌ सुदेवशर्म्मा ब्राह्मण के वचन को सुनकर बोले ॥ १३ ॥

श्रीहरि भगवान्‌ बोले – हे द्विज! पुत्र को छोड़ कर बाकी जो न देने के योग्य है उनको भी तुम्हारे लिये दूँगा। क्योंकि ब्रह्मा ने तुम्हारे लिये पुत्र का सुख नहीं लिखा है ॥ १४ ॥

मैंने तुम्हारे भालदेश में होने वाले समस्त अक्षरों को देखा उसमें सात जन्म तक तुमको पुत्र का सुख नहीं है ॥ १५ ॥

हरे पुत्रं विना शून्यं गार्हस्थ्यं मे न रोचते ॥ इति विप्रवचः श्रुत्वा जगाद हरिरीश्वरः ॥ १३ ॥

श्रीहरिरुवाच ॥ अदेयमपि ते सर्वं दास्ये पुत्रं विना द्विज ॥ तव पुत्रसुखं वत्स विधात्रा नैव निमितम्‌ ॥ १४ ॥

त्वदीयभालफलके वर्णाः सर्वे मयेक्षिताः ॥ तत्र नैवास्ति ते पुत्रसुखं सप्तसु जन्मसु ॥ १५ ॥

इत्याकर्ण्य हरेर्वाक्यं वज्रनिर्धातनिष्ठुतरम्‌ ॥ स पपात महीपृष्ठे छिन्नमूल इव द्रुमः ॥ १६ ॥

पतिं पतितमालोक्य प्रमदाऽत्यन्तदुःखिता ॥ पश्यन्ती स्वामिनं पुत्रस्पृहाशून्यमरूरुदत्‌ ॥ १७ ॥

पश्चाद्धैर्यं समालम्ब्य साऽवोचत्‌ पतितं पतिम्‌ ॥ गौतम्युवाच ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ हे नाथ किं न स्मरसि मे वचः ॥ १८ ॥

इस प्रकार वज्रप्रहार के समान निष्ठु्र हरि भगवान्‌ के वचन को सुनकर जड़ के कट जाने से वृक्ष के समान वह सुदेवशर्म्मा ब्राह्मण पृथिवी तल पर गिर गया ॥ १६ ॥

पति को गिरे हुए देखकर गौतमी स्त्री अत्यन्त दुःखित हुई और पुत्र की अभिलाषा से वंचित अपने स्वामी को देखती हुई रुदन करने लगी ॥ १७ ॥

बाद धौर्य का आश्रय लेकर गौतमी स्त्री गिरे हुए पति से बोली। गौतमी बोली – हे नाथ! उठिये, उठिये, क्या मेरे वचन का स्मरण नहीं करते हैं? ॥ १८ ॥

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