अध्याय १५

ब्रह्मा ने भालदेश में जो सुख-दुःख लिखा है वह मिलता है। रमानाथ क्या करेंगे? मनुष्य तो अपने किये कर्म का फल भोगता है ॥ १९ ॥

अभागे पुरुष का उद्योग, मरणासन्न पुरुष को औषध देने के समान निष्फल हो जाता है। जिसका भाग्य प्रतिकूल (उल्टा) है उसका किया हुआ सब उद्योग व्यर्थ होता है ॥ २० ॥

समस्त वेदों में यज्ञ, दान, तप, सत्य, व्रत, आदि की अपेक्षा हरि भगवान्‌ का सेवन श्रेष्ठ कहा है परन्तु उससे भी भाग्य बल श्रेष्ठ है ॥ २१ ॥

विधात्रा लिखितं भाले तल्लभेत सुखासुखम्‌ ॥ किं करोति रमानाथः स्वकृतं भुञ्जते नरः ॥ १९ ॥

अभाग्यस्य कृतोद्योगो मुभूर्षोरिव भेषजम्‌ ॥ तस्य सर्वं भवेद्‌व्यर्थं यस्य दैवमदक्षिणम्‌ ॥ २० ॥

क्रतुदानतपः सत्यव्रतेभ्यो हरिसेवनम्‌ ॥ श्रेष्ठं सर्वेषु वेदेषु ततो दैवबलं वरम्‌ ॥ २१ ॥

तस्मात्‌ सर्वत्र विश्वासं विहायोत्तिष्ठ भूसुर ॥ दैवमेवावलम्याेदेषशु हरिणा किं प्रयोजनम्‌ ॥ २२ ॥

इत्यातकर्ण्य वचस्तरस्यावस्ती व्रशोकसमन्वितम्‌ ॥ वैनतेयोऽवदद्विष्णुंं क्षोभसञ्जातवेपथुः ॥ २३ ॥

गरुड उवाच ॥ शोकसागरसंमग्नां  ब्राह्मणीं वीक्ष्यु हे हरे ॥ तथैव ब्राह्मणं नेत्रगलद्वाष्पषकुलाकुलमु ॥ २४ ॥

इसलिये हे भूसुर! सर्वत्र से विश्वास को हटा कर उठिये और शीघ्र दैव का ही आश्रय लीजिये। इसमें हरि का क्या॥ काम है? ॥ २२ ॥

इस प्रकार उस गौतमी के अत्यन्त शोक से युक्त वचन को सुनकर दुःख से काँपते हुए गरुड़जी विष्णुआ भगवान्‌ से बोले ॥ २३ ॥

गरुड़जी बोले – हे हरे! शोकरूपी समुद्र में डूबी हुई ब्राह्मणी को उसी तरह नेत्र से गिरते हुए अश्रुधारा से व्या कुल ब्राह्मण को देखकर ॥ २४ ॥

Pages: 1 2 3 4 5 6 7