अध्याय १५

हे दीनबन्धो ! हे दयासिन्धोश! हे भक्तों के लिये अभय को देनेवाले! हे प्रभो! भक्तों के दुःख को नहीं सहने वाले! आपकी आज वह दया कहाँ चली गई? ॥ २५ ॥

अहो! आप वेद और ब्राह्मण की रक्षा करने वाले साक्षात्‌ विष्णुि हो। इस समय आपका धर्म कहाँ गया? अपने भक्त को देने के लिये चार प्रकार की मुक्ति आपके हाथ में ही स्थित कही है ॥ २६ ॥

अहो! फिर भी वे आपके भक्त उत्तम भक्ति को छोड़कर चतुर्विध मुक्ति की इच्छा नहीं करते हैं और उनके सामने आठ सिद्धियाँ दासी के समान स्थित रहती हैं ॥ २७ ॥

दीनबन्धोिदयासिन्धोप भक्तानामभयङ्कर ॥ भक्तदुःखासहिष्णोकस्तेन दयाऽद्य क्क गता प्रभो ॥ २५ ॥

अहो ब्रह्मण्यददेवस्वं‍मान त्विद्धर्मः क्क गतोऽधुना ॥ त्वद्भक्तस्य चतुर्धाऽपि मुक्तिः करतले स्थिता ॥ २६ ॥

अहो तथापि नेच्छन्ति विहाय भक्तिमुत्तमाम्‌ ॥ तदग्रे सिद्धयश्चाष्टौ किङ्करीभूय संस्थिताः ॥ २७ ॥

त्वदाराधनमाहात्म्मेवं सर्वत्र विश्रुतम्‌ ॥ तहि विप्रस्य पुत्रेच्छापूरणे कः परिश्रमः ॥ २८ ॥

गजमर्पयतः पुंसो ह्यङ्‌कुशे कः परिश्रमः ॥ अतः परं न केनापि सेव्यते ते पदाम्बुजम्‌ ॥ २९ ॥

यददृष्टगतं पुंसस्तदेव भविता ध्रुवम्‌ ॥ इति लोके प्रथा जाता त्वद्भक्तिर्विलयं गता ॥ ३० ॥

आपके आराधन का माहात्म्य सब जगह सुना है। तब इस ब्राह्मण के पुत्र की वाञ्छाज पूर्ण करने में आपको क्या परिश्रम है? ॥ २८ ॥

हाथी दान करने वाले पुरुष को अंकुश दान करने में क्या परिश्रम है? अब आज से कोई भी आपके चरण-कमल की सेवा नहीं करेगा ॥ २९ ॥

जो पुरुष के भाग्य में होता है वही निश्चय रूप से प्राप्त होता है। इस बात की प्रथा आज से संसार में चल पड़ी और आपकी भक्ति रसातल को चली गई अर्थात्‌ लुप्त हो गई ॥ ३० ॥

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