अध्याय १५

हे नाथ! आप करने तथा न करने में स्वतंत्र हैं यह आपका सामर्थ्य सर्वत्र विख्यात है आज वह सामर्थ्य इस ब्राह्मण को पुत्र प्रदान न करने से नष्ट होता है ॥ ३१ ॥

इसलिये आप इस ब्राह्मण के लिये अवश्य  एक पुत्र प्रदान कीजिये। सुदामा ब्राह्मण ने आपकी आराधना कर उत्तम वैभव को प्राप्त किया ॥ ३२ ॥

कर्तुं न कर्तुं सामर्थ्यं तव सर्वत्र विश्रुतम्‌ ॥ तदेवाद्य गतं नाथ न चेदस्मै सुतप्रदः ॥ ३१ ॥

अतस्त्वं  सर्वथा देहि पुत्रमेकं द्विजन्मने ॥ सुदामा त्वां समाराध्य लेभे वैभवमुत्तमम्‌ ॥ ३२ ॥

सान्दीपिनिर्मृतं पुत्रमवाप कृपया तव ॥ इति ते शरणं प्राप्तौ दम्पती पुत्रलालसौ ॥ ३३ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ इति गरुडवचो निशम्य॥ विष्णुरर्वचनमुवाच खगं सुधोपमानम्‌ ॥ अयि खगवर पुत्रमेकमस्मै वितर मनोगतमाशु वैनतेय ॥ ३४ ॥

आपकी कृपा से सान्दीपिनि गुरु ने मृत पुत्र को प्राप्त किया। इन कारणों से पुत्र की लालसा करनेवाले ये दोनों स्त्री-पुरुष आपकी शरण में आये हैं ॥ ३३ ॥

श्रीनारायण बोले – इस प्रकार विष्णु  भगवान्‌ अमृत के समान गरुड़ के वचन को सुनकर गरुड़जी से बोले – अयि! पक्षिवर! हे वैनतेय! इस ब्राह्मण को अभिलषित एक पुत्र शीघ्र दीजिये ॥ ३४ ॥

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