अध्याय १६

श्रीनारायण बोले – हे महाप्राज्ञ! हे नारद! बाल्मीकि ऋषि ने जो परम अद्भुत चरित्र दृढ़धन्वा राजा से कहा उस चरित्र को मैं कहता हूँ तुम सुनो ॥ १ ॥

बाल्मीकि ऋषि बोले – हे दृढ़धन्वन! हे महाराज! हमारे वचन को सुनिये। गरुड़ जी ने केशव भगवान्‌ की आज्ञा से इस प्रकार ब्राह्मणश्रेष्ठ से कहा ॥ २ ॥

गरुड़जी बोले – हे द्विजश्रेष्ठ! तुमको सात जन्म तक पुत्र का सुख नहीं है यह जो वचन हरि भगवान्‌ ने कहा सो इस समय तुमको वैसा ही है ॥ ३ ॥

श्रीनारायण उवाच ॥ श्रृणु नारद वक्ष्ये्ऽहं यदुक्तं दृढधन्वने ॥ वाल्मीकिना महाप्राज्ञ चरितं परमाद्‌भुतम्‌ ॥ १ ॥

वाल्मीकिरुवाच ॥ दृढधन्वन्‌ महाराज श्रृणुष्वु वचनं मम ॥ सुपर्णः केशवादेशादिदमाह द्विजेश्वरम्‌ ॥ २ ॥

गरुड उवाच ॥ सप्त जन्म्सु ते पुत्रसुखं नास्तीति यद्वचः ॥  हरिणोक्तंु द्विजश्रेष्ठ तत्तयैव तवाधुना ॥ ३ ॥

तथापि स्वामिनाऽऽज्ञप्तः कृपया दद्मि ते सुतम्‌ ॥ मदंशसम्भवः पुत्रो भविता ते तपोधन ॥ ४ ॥

येन त्व्माशिषः सत्या लप्य्   ते गौतमीयुतः ॥ परं तज्जनितं दुःख युवयोर्भविता ध्रुवम्‌ ॥ ५ ॥

धन्यो्ऽसि द्विजशार्दूल यत्ते जाता हरौ मतिः ॥ सकामाऽप्यरथ निष्का मा हरिभक्तिर्हरेः प्रिया ॥ ६ ॥

फिर भी कृपा से स्वा्मी की आज्ञा पाकर मैं तुमको पुत्र दूँगा। हे तपोधन! हमारे अंश से तुमको पुत्र होगा ॥ ४ ॥

जिस पुत्र से गौतमी के साथ तुम मनोरथ को प्राप्त करोगे; किन्तुप उस पुत्र से होनेवाला दुःख तुम दोनों को अवश्य  होगा ॥ ५ ॥

हे द्विजशार्दूल! तुम धन्य  हो जो तुम्हा्री बुद्धि हरि भगवान्‌ में हुई। हरिभक्ति सकाम हो अथवा निष्कातम हो, हरि भगवान्‌ को दोनों ही प्रिय हैं ॥ ६ ॥

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