अध्याय १६

मनुष्‍‍यों का शरीर जल के बुदबुद के समान क्षण में नाश होनेवाला है उस शरीर को प्राप्त कर जो हृदय में हरि के चरणों का चिन्तकन करता है वह धन्या है ॥ ७ ॥

इस अत्य्न्तक दुस्त र संसार से तारनेवाले हरि भगवान्‌ के अलावा दूसरा और कोई नहीं है, यह हरि भगवान्‌ की ही कृपा से मैंने तुमको पुत्र दिया ॥ ८ ॥

मन में श्रीहरि को धारणकर सुखपूर्वक विचारों और उदासीन भाव से संसार के सुखों को भोगो ॥ ९ ॥

जलबुद्‌बुदवत्‌ पुंसां शरीरं क्षणभङ्‌गुरम्‌ ॥ तदासाद्य हरेः पादं धन्येश्चिन्तहयते हृदि ॥ ७ ॥

हरेरन्यो् न संसारात्तारयेद्‌बहुदुस्तणरात्‌ ॥ हरेरेव कृपालेशान्मपया दत्तः सुतस्तहव ॥ ८ ॥

मनसि श्रीहरिं धृत्वा  विचरस्वं यथासुखम्‌ ॥ उदासीनतया स्थित्वाा भुङ्‌क्ष्वी संसारजं सुखम्‌ ॥ ९ ॥

वाल्मी्किरुवाच ॥ दम्पवत्योः  पश्य‍तोः सद्यो दत्वाे वरमनुत्तमम्‌ ॥ खगद्वारा हरिः शीघ्रं ययौ निजनिकेतनम्‌ ॥ १० ॥

सुदेवोऽपि सपत्निको वरं लब्वावा व मनोगतम्‌ ॥ आसाद्य स्व‍गृहं भेजे गार्हस्य्  ससुखमुत्तमम्‌ ॥ ११ ॥

कियत्कापलक्रमेणास्याव दोहदः समपद्यत ॥ दशमे मासि सम्प्राप्ते॥ पूर्णो गर्भो बभूव ह ॥ १२ ॥

बाल्मीकि ऋषि बोले – गौतमी और सुदेव दोनों स्त्री पुरुष के देखते-देखते उत्तम वर को देकर उसी समय गरुड़ पर सवार होकर भगवान्‌ हरि शीघ्र ही वैकुण्ठो को चले गये ॥ १० ॥

सुदेवशर्म्मा भी स्त्री के साथ अपने मन के अनुसार पुत्ररूप वर को पाकर अपने घर को आया और उत्तम गृहस्थाश्रम के सुख को भोगने लगा ॥ ११ ॥

कुछ समय बीतने के बाद गौतमी को गर्भ रहा और दशम महीना प्राप्त होने पर गर्भ पूर्ण हुआ ॥ १२ ॥

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