अध्याय १६

प्रसूतिकाल आने पर गौतमी ने उत्तम पुत्र पैदा किया और पुत्र के होने पर सुदेवशर्म्मा बहुत प्रसन्न हुआ ॥ १३ ॥

श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाकर जातकर्म संस्काशर किया और अच्छी  तरह स्नान कर ब्राह्मणश्रेष्ठ सुदेवशर्म्मा ने उन ब्राह्मणों को बहुत दान दिया ॥ १४ ॥

ब्राह्मण और स्वजनों के साथ बुद्धिमान्‌ सुदेवशर्म्मा ने नामकरण संस्कार किया। कृपालु गरुड़जी ने प्रेम से यह पुत्र दिया ॥ १५ ॥

प्रसूतिकाले सम्प्राप्तेस साऽसूत सुतमुत्तमम्‌ ॥ सुदेवस्त्वात्मजे जाते जाताह्लादो बभूव ह ॥ १३ ॥

आहूय जातकं कर्म चकार द्विजसत्तमान्‌ ॥ बृहद्दानं ददौ तेभ्यः सुस्नातो द्विजसत्तमः ॥ १४ ॥

नाम चास्याऽकरोद्धीमान्‌ ब्राह्मणैः स्वजनैर्वृतः ॥ अयं सुतः सुपर्णेन दत्तः प्रेम्णा कृपालुना ॥ १५ ॥

शारदेन्दुरिव प्रोद्यत्तेजस्वी शुकसन्निभः ॥ शुकदेवेति नामायं पुत्रोऽस्तु मम वल्लभः ॥ १६ ॥

अवर्धत सुतः शीघ्रं शुक्लपक्ष इवोडुपः ॥ पितुर्मनोरथैः साकं मातृमानसनन्दनः ॥ १७ ॥

उपनोय सुतं तातः सावित्रीं दत्तवान्‌ मुदा ॥ संस्कारं वैदिकं प्राप्य ब्रह्मचर्यव्रते स्थितः ॥ १८ ॥

शरत्‌कालीन चन्द्रमा के समान उदय को प्राप्त, तेजस्वी, यह शुक के सदृश है इसलिए मेरा यह प्रिय पुत्र शुकदेव नामवाला हो ॥ १६ ॥

माता के मन को आनन्द देनेवाला वह पुत्र पिता के मनोरथों के साथ-साथ शुक्लपक्ष के चन्द्रसमा के समान बढ़ने लगा ॥ १७ ॥

पिता ने हर्ष के साथ उपनयन संस्कार कर गायत्री मन्त्र का उपदेश किया। बाद वह बालक वेदारम्भ संस्कार को प्राप्त कर ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित हुआ ॥ १८ ॥

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