अध्याय १६

उस ब्रह्मचर्य के तेज से युक्त बालक साक्षाद्‌‌ दूसरे सूर्य के समान शोभित हुआ। बुद्धिसागर उस बालक ने वेद का अध्ययन प्रारम्भ किया ॥ १९ ॥

उस गुरुवत्सल बालक ने सद्‌बुद्धि से अपने गुरु को प्रसन्न किया और गुरु के एक बार कहने मात्र से समस्त विद्या को प्राप्त किया ॥ २० ॥

बाल्मीकि ऋषि बोले – एक समय कोटि सूर्य के समान प्रभाव वाले देवल ऋषि आये। उनको देखकर हर्ष से सुदेव शर्म्मा ने दण्डवत्‌ प्रणाम किया ॥ २१ ॥

तत्तेजसाऽन्वितो रेजे साक्षात्सूर्य इवापरः ॥ वेदाध्ययनमारेभे कुमारो बुद्धिसागरः ॥ १९ ॥

सद्‌बुद्धयाऽऽनन्दयामास स्वगुरुं गुरुवत्सलः ॥ सकृन्निगदमात्रेण बिद्यां सर्वामुपेयिवान्‌ ॥ २० ॥

बाल्मीकिरुवाच ॥ एकदा देवलोऽम्यागात्‌ कोटिसूर्यसमप्रभः ॥ तमालोक्य सुदेवोऽसौ ननाम दण्डवन्मुदा ॥ २१ ॥

पूजयामास विधिवदर्ध्यपाद्यादिभिर्मुनिम्‌ ॥ आसनं कल्पयामास देवलाय महात्मने ॥ २२ ॥

तत्रोपविष्टो भगवान्‌ देवलो देवदर्शनः ॥ चरणे पतितं दृष्ट्वा कुमारं देवलोऽब्रवीत्‌ ॥ २३ ॥

देवल उवाच ॥ भो भो सेदेव धन्योऽसि तुष्टस्ते भगवान्‌ हरिः ॥ यतस्त्वं प्राप्तवान्‌ पुत्रं दुर्लभं सुन्दरं वरम्‌ ॥ २४ ॥

अर्ध्य, पाद्य आदि से विधिपूर्वक उन देवल मुनि की पूजा की और महात्मा देवल के लिए आसन दिया ॥ २२ ॥

अति तेजस्वी देवदर्शन देवल ऋषि उस आसन पर बैठ गये। बाद अपने चरणों पर बालक को गिरे हुए देखकर देवल ऋषि बोले ॥ २३ ॥

देवल मुनि बोले – भो भो सेदेव! तुम धन्य हो, तुम्हारे ऊपर भगवान्‌ प्रसन्न हुए, क्योंकि तुमने दुर्लभ, सुन्दर, श्रेष्ठ पुत्र को प्राप्त किया ॥ २४ ॥

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