अध्याय १६

ऐसा विनीत, बुद्धिमान्‌, बोलने में चतुर वेदपाठी और शीलवान्‌ पुत्र कहीं भी किसी के यहाँ नहीं देखा ॥ २५ ॥

हे पुत्र! यहाँ आओ, तुम्हारे हाथ में यह कौतुक क्या देखता हूँ? सुन्दर छत्र, दो चामर, यवरेखा के साथ कमल ॥ २६ ॥

जानु तक लटकने वाले हाथी के सूँड़ के समान ये तुम्हा‍रे हाथ, कान तक फैले हुए विशाल लाल नेत्र, ॥ २७ ॥

एतादृशः सुतः क्कापि न कस्याप्यवलोकितः ॥ विनीतो बुद्धिमान्‌ वाग्मी वेदाध्ययनशीलवान्‌ ॥ २५ ॥

एहि पुत्र किमेतत्ते करे पश्यामि कौतुकम्‌ ॥ सच्छत्रं चामरयुगं कमलं यवसंयुतम्‌ ॥ २६ ॥

आजानुलम्बिनौ हस्तौ  हस्तिहस्तसमौ तव ॥ आकर्णान्तविशाले च चक्षुषी मधुपिञ्जरे ॥ २७ ॥

वपुर्वर्तुलकं मध्यं वलित्रय विभूषितम्‌ ॥ एवमुक्त्वा  सुतं दृष्ट्वा पुनराहोत्सुकं द्विजम्‌ ॥ २८ ॥

अहो सुदेव तनयस्तवायं गुणसागरः ॥ गूढजत्रुः कम्बुकण्ठः स्निग्धरकुञ्चितमूर्धजः ॥ २९ ॥

तुङ्गगवक्षाः पृथुग्रीवः समकर्णो वृषांसकः ॥ सर्वलक्षणसम्पूर्णः पुत्रो भाग्यनिधिर्महान्‌‌ ॥ ३० ॥

शरीर गोल आकार का, त्रिवली से युक्त पेट है। इस प्रकार उस बालक के विषय में कहकर उस ब्राह्मन को उत्कण्ठित देख कर देवल ऋषि फिर बोले ॥ २८ ॥

अहो! हे सुदेव! यह तुम्हारा लड़का गुणों का समुद्र है। कंधा और कोख का सन्धि स्थान गूढ़ है, शंख के समान उतार-चढ़ाव युक्त गला वाला, चिक्कण टेढ़े शिर के बाल वाला ॥ २९ ॥

ऊँची छाती, लम्बी गर्दन, बराबर कान, बैल के समान कन्धा, इस तरह समस्त लक्षणों से युक्त यह पुत्र श्रेष्ठ भाग्य का निधि है ॥ ३० ॥

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