अध्याय १६

एक ही बहुत बड़ा दोष है जिससे सब व्यर्थ हो गया। इस प्रकार कह कर शिर काँपते हुए दीर्घ श्वा स लेकर देवल मुनि बोले – ॥ ३१ ॥

प्रथम आयु की परीक्षा करना, बाद लक्षणों को कहना चाहिये। आयु से हीन बालक के लक्षणों से क्या प्रयोजन है? ॥ ३२ ॥

हे सुदेव! यह तुम्हारा लड़का बारहवें वर्ष में डूब कर मर जायगा, इससे तुम मन में शोक नहीं करना ॥ ३३ ॥

एक एव महान्‌ दोषो येन सर्वं वृथा कृतम्‌ ॥ इत्युक्त्वा मौलिमाधुन्वन्‌‌ विनिःश्वस्याब्रवीन्मुनिः ॥ ३१ ॥

पूर्वमायुः परीक्षेत पश्चाल्लक्षणमादिशेत्‌ ॥ निरायुषः कुमारस्य लक्षणैः किं प्रयोजनम्‌ ॥ ३२ ॥

सुदेवं तनयोऽयं ते द्वादशे हायेन जले ॥ मृत्युमेष्यति तस्मात्त्वं शोकं मा कुरु मानसे ॥ ३३ ॥

अवश्यम्भाविनो भावा भवन्त्येाव न संशयः ॥ तत्र प्रतिविधिर्नास्ति मुमूर्षुरिव भेषजम्‌ ॥ ३४ ॥

बाल्मीकिरुवाच ॥ इत्युदीर्य गतो ब्रह्मलोकं देवलको मुनिः ॥ सुदेवः सह गौतम्या पपात धरणीतले ॥ ३५ ॥

विललाप चिरं भूमौ देवलोक्तं वचः स्मरन्‌ ॥ अथ सा गौतमी पुत्रं स्वाङ्कमारोप्य धैर्यतः ॥ ३६ ॥

अवश्य होने वाला निःसन्दे‍ह होकर ही रहता है, मरणासन्न को औषध देने के समान उसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं है ॥ ३४ ॥

बाल्मीकि मुनि बोले – देवल मुनि इस प्रकार कहकर ब्रह्मलोक को चले गये और गौतमी के साथ सुदेव ब्राह्मण पृथिवी पर गिर गया ॥ ३५ ॥

पृथिवी पर पड़ा हुआ देवल ऋषि के कहे हुए वचनों को स्मरण कर चिरकाल तक विलाप करने लगा। बाद उसकी स्त्री गौतमी धैर्य्य धारण करती हुई पुत्रका अपनी गोद में लेकर ॥ ३६ ॥

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