अध्याय १६

प्रथम प्रेम से पुत्र का मुख चुम्बन कर बाद पति से बोली। गौतमी बोली – हे द्विजराज! होने वाली वस्तु में भय नहीं करना चाहिये ॥ ३७ ॥

जो नहीं होनेवाला है वह कभी नहीं होगा और जो होने वाला है वह होकर रहेगा। क्या राजा नल, रामचन्द्र और युधिष्ठिर दुःख को प्राप्त नहीं हुये? ॥ ३८ ॥

राजा बलि भी बन्धन को प्राप्त हुआ, यादव नाश को प्राप्त हुए, हिरण्याक्ष कठिन वध को प्राप्त हुआ, वृत्रासुर भी मृत्यु को प्राप्त हुआ ॥ ३९ ॥

चुचुम्ब वदनं प्रेम्णा पश्चात्‌ पतिमुवाच सा ॥ गौतम्युवाच ॥ द्विजराज न कर्तव्या भीतिर्भाव्येषु वस्तुषु ॥ ३७ ॥

नाभाव्यं भविता कुत्र भाव्यमेव भवष्यति ॥ किं नु नो दुःखमापन्ना नलरामयुधिष्ठिराः ॥ ३८ ॥

बन्धनं बलिराजाऽपि प्राप्तवान्‌ यादवः क्षयम्‌ ॥ हिरण्याक्षो वधं घोरं वृत्रोऽपि निधनं गतः ॥ ३९ ॥

कार्त्तवीर्यः शिरश्छेदं रावणोऽपि तथाप्तवान्‌ ॥ विरहं रघुनाथोऽपि जानक्याः प्राप्तवान्‌ मुने ॥ ४० ॥

परीक्षिदपि राजर्षिर्ब्राह्मणान्मृत्युमाप्तवान्‌ ॥ एवं ये भाविनो भावा भवन्त्येव मुनीश्वर ॥ ४१ ॥

अतः उत्तिष्ठ हे नाथ हरिं भज सनातनम्‌ ॥ शरण्यं सर्वजीवानां निर्वाणपददायकम्‌ ॥ ४२ ॥

सहस्रार्जुन का शिर काटा गया, रावण के भी उसी तरह शिर काटे गये, हे मुने! भगवान्‌ रामचन्द्र भी वन में जानकी के विरह को प्राप्त हुए ॥ ४० ॥

राजर्षि परीक्षित भी ब्राह्मण से मृत्यु को प्राप्त हुये। हे मुनीश्वेर! इस प्रकार जो होने वाला है वह अवश्य होता है ॥ ४१ ॥

इसलिये हे नाथ! उठिये और सनातन हरि भगवान्‌ का भजन करिये जो समस्त जीवों के रक्षक हैं और मोक्ष पद को देने वाले हैं ॥ ४२ ॥

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